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रामधारी सिंह 'दिनकर' | RAMDHARI SINGH 'DINKAR'

राष्ट्रीयता के अमर स्वर - रामधारी सिंह दिनकर

साहित्य की परिभाषा के सन्दर्भ में एक बात यह भी कही गई है कि ‘सहितस्य भावः साहित्यम्’ अर्थात् जिसमें सबके हित की भावना हो वह साहित्य है। शायद यही कारण है कि साहित्य में विश्व-प्रेम और लोक-मंगल की भावनाओं को पुष्ट करने का प्रयास होता रहा है। साहित्य का चिन्तन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कीे मंत्र-भावना से अभिसिक्त होकर लोक-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता रहा है।   
इस तरह हिन्दी-साहित्य के सृजन में भी एक सार्वभौम और आदर्शोन्मुख मूल्यों की प्रतिष्ठा के प्रयास की परम्परा दिखलाई पड़ती है। मगर इसका अर्थ यह नहीं कि हम केवल आदर्शों की धुन पर अन्तर्राष्ट्रीय मानवता की सरगम ही बजाते रहंे और अपने परिवेश में घटित सामाजिक, राजनैतिक और राष्ट्रीय अस्मिता की समस्याओं की अनदेखी करते रहंे। यथार्थ के धरातल पर जनमानस की आँखों में तैरते प्रश्नों का समाधान ढूँढ़ना भी साहित्य-सृजन की प्रक्रिया की परिधि में आता है। समस्याओं से आँखें मूंद कर शुद्ध कविता की खोज करना और धरती की तपन को भूल कर कल्पना-लोक में विचरण करना यह कवि की विज्ञ-दृष्टि नहीं कही जा सकती है। 

सच पूछा जाए तो कवि जहाँ आदर्शों के प्रति समर्पित हो वहीं अपने आस-पास के परिवेश से भी कटा न रह कर यथार्थ को रूपायित करने में भी समर्थ हो, तभी उसकी रचना-धर्मिता की सार्थकता है। देश गुलामी की बेड़ियों से जकड़ा हो, राष्ट्र की अस्मिता चैराहे पर नंगी हो रही हो और जनमानस किसी द्वन्द्व से ग्रस्त हो, वैसी परिस्थिति में मूक-दर्शक बने रहना कवि का अभीष्ट नहीं होना चाहिए-इस चिन्तनधारा ने राष्ट्रीय भावनाओं को मुखर होने का पथ प्रशस्त किया। यह राष्ट्रीय भावना कहीं तो परिस्थिति से आवेष्टित रहती है तो कभी राष्ट्रीय उत्थान की कल्पना से ओत-प्रोत। इसलिए कुछ विद्वान् परिवेश एवं परिस्थिति से जन्मी राष्ट्रीयता को युद्ध या क्रान्ति की राष्ट्रीयता एवं सामान्य रूप से उपजी राष्ट्रीयता को शान्ति की राष्ट्रीयता से अभिहित करते रहे हैं। यह विदित है कि राष्ट्र मात्र भूमि का टुकड़ा नहीं होता है, उस पर रहने वाले व्यक्ति और उनकी संस्कृति भी इससे जुड़ी रहती है। डा0 सुधीन्द्र के अनुसार भूमि, भूमिवासी जन और जन-संस्कृति के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है। भारत केवल भूमि मात्र नहीं बल्कि हमारी मातृभूमि भी है।
इस तरह राष्ट्र उस जन-समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है जिनका एक अपना भू-भाग हो, उसकी अपनी संस्कृति हो, एक अपना रीति-रिवाज हो और भू-भाग के प्रति समर्पण की भावना हो। अपने भू-भाग की रक्षा, संस्कृति की रक्षा, एकता की रक्षा, परम्परा और इतिहास की रक्षा करने वाली जो भावधारा है, उसे हम राष्ट्रीयता के नाम से जानतेे हंै। राष्ट्रीयता सदैव देश की अस्मिता से जुड़ी रहती है, राष्ट्र-प्रेम की ध्वनि राष्ट्रीयता में सदैव मुखरित होती रहती है, चाहे वह यजुर्वेद का मन्त्र ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम् पुरोहिताः’ हो अथवा भगवान् राम की वाणी ‘जननी जन्मभूमिष्च स्वर्गादपि गरीयसी’ हो, सब में राष्ट्र के प्रति असीम श्रद्धा एवं अटूट आस्था के भाव विद्यमान है, जिन्हें हम ‘राष्ट्रीयता’ शब्द से सम्बोधित कर सकते हैं। 

संस्कृत-साहित्य से लेकर भारत की विभिन्न भाषाओं में राष्ट्रीयता का यह उदात्त स्वर काव्य में प्रवाहित हुआ है। हिन्दी-साहित्य में चाहे वह अपभ्रंश काल हो, वीरगाथा काल हो, भक्ति काल हो, रीति काल हो या आधुनिक काल हो-सर्वत्र किसी-न-किसी रूप में राष्ट्रीयता का स्वरूप मुखरित होता हुआ दृष्टिगत होता है। भले ही कहीं-कहीं यह स्वर प्रच्छन्न रूप से है, कहीं सांकेतिक रूप में है तो कहीं काफी प्रबल आक्रामक रूप में भी है। आधुनिक काल में राष्ट्रीयता पर मुखर स्वर भारतेन्दु-युग में दिखलाई पड़ता है। इसके बाद यह चेतना विस्तृत आयाम लेती हुई नजर आती है और ‘दिनकर’ तक पहुँचते-पहुँचते इसके स्वरूप में प्रबल तेज उभर आता है। 

राष्ट्रीयता के नायक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्रा कुमारी चैहान, बालकृष्ण शर्मा नवीन, माखनलाल चतुर्वेदी आदि की परम्परा में उदात्त राष्ट्रीय काव्य की सृष्टि करने वालों में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का नाम अग्रगण्य है। ‘दिनकर’ का ‘दिनकरत्व उनकी राष्ट्रीय कविताओं में चमक उठा है और इस लिए राष्ट्रीयता के अमर गायक के रूप में हिन्दी-साहित्य में उन्हें प्रतिष्ठित किया गया है।
‘दिनकर’ ने अपनी काव्य-रचना से जनमानस को झकझोरा है और राष्ट्रीयता की ओजपूर्ण वाणी में धरती-पुत्र को जागरण का दिव्य संदेश दिया है। सत्य कहा जाए तो ‘राष्ट्रीयता‘ का स्वर ‘दिनकर’ की पहचान बन गई है। ‘दिनकर’ के व्यक्तित्व का निरूपण करते हुए डा0 सावित्री सिन्हा ने कहा है- ‘‘दिनकर के व्यक्तित्व में धरती-पुत्र का आत्मविश्वास और दृढ़ता, साहित्यकार की अनुभूति-प्रवणता, दार्शनिकता का तत्त्व-चिन्तन तथा राजपुरुष का ओज और तेज है।’’ मन्मथनाथ गुप्त के शब्दों में-‘‘उनकी कविता में उनका इन्द्रधनुषी वर्ण-व्यक्तित्व प्रबल रूप से सामने आता है। उनके व्यक्तित्व से प्रभुत्व की आभा छिटकती है, स्वाभिमान और आत्मविश्वास की प्रबलता भी व्यंजित होती है। 

‘दिनकर’ की रचनाओं में उनके समकालीन कवियों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कुछ प्रभाव तो है ही, विशेषकर युगीन परिस्थितियों से भी वे काफी प्रभावित हैं। देश पराधीनता की आग में झुलस रहा था, अंग्रेजों का दमन-चक्र चरम सीमा पर सीना ताने खड़ा था, ऐसी परिस्थिति में क्रान्तिकारी रचनाओं का प्रस्फुटन ‘दिनकर’ की वाणी से स्वतः होने लगा। 

कुछ विद्वान् यह मानते हैं कि ‘दिनकर’ की राष्ट्रीयता अन्तःस्फूर्त नहीं है बल्कि बाहर से आरोपित है। इस संदर्भ में वे ‘दिनकर’ की उक्ति को ही, जिसे उन्होंने ‘चक्रवाल’ की भूमिका में लिखा है, व्यक्त करते हैं-‘‘संस्कारों से मैं कला के सामाजिक पक्ष का प्रेमी अवश्य बन गया था, किन्तु मन मेरा भी चाहता था कि गर्जन-तर्जन से दूर रहूँ और केवल ऐसी ही कविताएँ लिखूँ जिनमें कोमलता और कल्पना का उभार हो। राष्ट्रीय और क्रान्तिकारी होने का सुयश तो मुझे ‘हुंकार’ से ही मिला, किन्तु आत्मा मेरी अब भी ‘रसवन्ती’ में बसती है.......राष्ट्रीयता मेरे व्यक्तित्व के भीतर से नहीं जन्मी, उसने बाहर से आकर मुझे आक्रान्त किया है।’’ इसलिए कुछ विद्वानों का मत है कि ‘दिनकर’ की राष्ट्रीयता आपद्धर्म की राष्ट्रीयता है या युद्ध-काल की राष्ट्रीयता है, यह उनकी आत्मा की ध्वनि नहीं है। किन्तु लक्ष्मीनारायण ‘सुधांशु’ ने स्पष्ट रूप से अपने लेख ‘स्वराज्योत्तर दिनकर साहित्य’ में लिखा है-‘‘मैं दिनकर जी के इस आत्म-विश्लेषण को स्वीकार नहीं करता। 

राष्ट्रीयता उनकी आत्मा का प्रधान स्वर रहा है। इससे बचने का उन्होंने जो भी प्रयास किया है, वह बौद्धिक है। किन्तु संकट के समय मनुष्य बुद्धि नहीं , भावना के अधीन हो जाता है.....। भारत पर जब चीन ने आक्रमण किया, दिनकर जी के समस्त व्यक्तित्व पर राष्ट्रीयता अत्यन्त उग्र बनकर छा गई। इस तरह ‘दिनकर’ राष्ट्रीय चेतना के कवि हैं, ओज और पौरुष के कवि हैं तथा राष्ट्र के व्यावहारिक धर्म के गर्जन के कवि है। राष्ट्रीयता उनकी आत्मा का स्पन्दन है।

राष्ट्रीयता के इस अमर गायक की काव्य-कृतियों में रेणुका, सामधेनी, हुंकार, द्वन्द्वगीत, रसवन्ती, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा और हारे को हरिनाम आदि प्रमुख हैं। यद्यपि ‘दिनकर’ की करीब तीस से अधिक पुस्तकें प्र्रकाशित हैं, मगर ‘दिनकर’ का तेज पूरी प्रखरता से रेणुका, सामधेनी, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा में जलता दृष्टिगत होता है जिसमें राष्ट्रीय-चेतना का मुखर स्वर सुनाई पड़ता है। राष्ट्रीयता के इस अमर गायक को सार्वदेशिक प्रसिद्धि उस समय मिली जब सन् 1933 में ‘हिमालय के प्रति’ नामक कविता में कवि ने हिमालय से कहा-
‘‘रे ! रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उसको स्वर्ग धीर !पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।।’’
इतना ही नहीं, हिमालय को एक तपस्वी यती के रूप में सम्बोधित करते हुए उन्होंने पुनः कहा -   
      
‘‘तू मौन त्याग, कर सिंह नाद, रे तपी ! आज तप का न काल।          नवयुग-शंखध्वनि जगा रही,तू जाग, जाग, मेरे विशाल।।’’
इसमें स्वातन्त्रय-युद्ध के लिए जागने का आह्वान है। दिनकर का यह जागरण-मन्त्र उस समय के नौजवानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। कवि की वाणी उनके कण्ठ में गीत बनकर बस गई ।      
‘रेणुका’ दिनकर जी का प्रथम कविता-सग्रंह है, जिसका प्रथम संस्करण सन् 1935 में प्रकाशित हुआ था। इसकी पहली रचना ‘तांडव’ में ही जिस क्रान्तिपरक भावना का उद्रेक हुआ है, वह कवि के व्यक्तित्व में छिपे अंगार को रूपायित करता है। यथा - 
‘‘नाचो, अग्निखण्ड भर स्वर में, 

फूँक-फूँक ज्वाला अम्बर में,    
अनिल-कोष, द्रुम-दल, जल-थल में, 
अभय विश्व के उर-अन्तर में,        
गिरे विभव का दर्प चूर्ण हो, 
लगे आग इस आडम्बर में।’’
क्रान्ति और संघर्ष के इस काल में द्विधाग्रस्त होना क्लीवत्व का परिचायक है। जब देश की आजादी के लिए स्वातन्त्रय समर में कूदने का समय आ गया हो उस समय किसी सुविधाभोगी प्रवृत्ति के कारण द्विधाग्रस्त होना कवि को बिल्कुल अभीष्ट नहीं है। कवि ऐसी परिस्थिति में देश के नवयुवकों को द्विधापूर्ण मनःस्थिति का त्याग कर इस संघर्ष-समर में कूदने का आह्वान करता है। कवि की निर्भीक वाणी गूंज उठती है -
‘‘हिल रहा है धरा का शीर्ण मूल जल रहा दीप्त सारा खगोल, तू सोच रहा क्या अचल मौन? ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल।’’
मगर क्रान्ति ‘रेणुका’ में जहाँ राष्ट्रीयता की चिनगारी सुलगती हुई दिखलाई पड़ती है, वहीं हुंकार, सामधेनी, द्वंद्वगीत, रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र और परशुराम की प्रतीक्षा में उनका प्रज्वलित रूप दृष्टिगत होता है, जिसमें प्रखर तेज है। यह तेज कहीं-कहीं आँखों में गड़ने लगता है मगर अपनी एक अलग पहचान भी छोड़ जाता है-वह पहचान जिसमें दिनकर का ‘दिनकरत्व’ जागता रहता है। 
‘हुंकार‘ में ‘दिनकर‘ की काव्य-रश्मियों में एक तीक्ष्णता का बोध होता है। ‘हुंकार‘ के ‘आमुख’ में जिन प्रतीकों का चित्रण किया गया है वे दिनकर की काव्य-चेतना को चित्रित करने में सर्वथा सक्षम हैं। वर्तमान के पल ने ही कवि को किसी शाश्वत दार्शनिक चिन्तन से विरत करके क्रान्ति-गीत गाने के लिए प्रेरित किया है। सामयिकता का स्वर सुनकर अपना सब कुछ बलिदान करने का संकल्प निश्चय ही राष्ट्रीयता की परिधि को पुष्टता प्रदान करता है। ‘हुंकार‘ की ‘आमुख’ कविता में यह प्रेरणाप्रद प्रसंग सुस्पष्ट हो चला है-
‘‘समय-ढूह की ओर सिसकते मेरे गीत विकल धाये;
आज खोजते उन्हें बुलाने वर्तमान के पल आये?
शैल-शृंग चढ़ समय-सिन्धु के आर-पार तुम हेर रहे,
किन्तु ज्ञात क्या तुम्हें, भूमि का कौन दनुज पथ घेर रहे?
दो वज्रों का घोष, विकट संघात धरा पर जारी है,
वह्नि-रेणु चुन स्वप्न सजा लो, छिटक रही चिनगारी है।
रण की घड़ी, जलन की वेला, रुधिर-पंक में गान करो,
अपना साकल धरो कुण्ड में, कुछ तुम भी बलिदान करो।’’
‘हुंकार‘ में स्वयं कवि अपना परिचय स्पष्ट कर देता है-
‘‘सुनूँ क्या सिन्धु ! मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म का हुंकार हूँ मैं,
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का,
प्रलय-गाण्डीव की टंकार हूँ मैं।’’
युग की विभीषिका को कवि ने पहचाना और राष्ट्रीयता का शंखनाद करके राजनीतिक दासता का अन्त, आर्थिक विषमता का परिहार और मानवता को त्राण दिलाने के लिए अपनी अनुभूति की मार्मिकता से क्रान्ति का पथ प्रशस्त किया। ‘हुंकार‘  की कविताओं-असमय आह्वान, बसन्त के नाम पर, साधना और द्विधा, दिगम्बरी, विपथगा, स्वर्ग-दहन, हिमालय आदि में राष्ट्र की वेदी पर कवि अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को उत्सर्ग कर देता है। डाॅ0 श्रीमती उमा शुक्ल ने लिखा है- ‘‘जीवन के शाश्वत मूल्यों के साथ युगीन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति भी कवि का दायित्व है क्योंकि युगबोध से कटा साहित्य अतीत की श्रीवृद्धि भले ही कर ले पर मौलिकता का स्पर्श नहीं कर सकता। दिनकर जी ने हमेशा युगीन परिस्थितियों का डटकर सामना किया। उसके आगे कभी मस्तक न झुकाकर उन्होंने सीना तान कर आह्वान किया है। यदि हम उन्हें युग की पुकार का कवि कहें तो अत्युक्ति न होगी।’’ असमय आह्वान में कवि की वाणी इस भावोद्रेक से फूट पड़ती है --
‘‘फेंकता हूँ, लो , तोड़-मरोड़
अरी निष्ठुरे ! वीना के तार,
उठा चाँदी का उज्ज्वल शंख
फूँकता हूँ भैरव-हुंकार।’’
‘रेणुका‘ और ‘हुंकार‘ का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए डाॅ0 परमेश्वर भारती ने बड़ा सुन्दर लिखा है- ‘‘रेणुका में दिनकर की स्थिति उस अंगार की तरह है जो राख से ढका हुआ है किन्तु हुंकार में कवि की वाणी अत्यन्त ओज प्रदीप्त है। यहाँ उनका खून भभक उठा है।’’ इस तरह दिनकर की कविताओं में एक दाहक शक्ति है, कलात्मक ओज है और सबसे बढ़कर धरती की ज्वाला की प्रतिध्वनि है। इसलिए ‘विपथगा’ में कवि इस मिट्टी की आग से अम्बर में आग लगाने की बात करता है -
‘‘मुझ विपथगामिनी को न ज्ञात, किस रोज किधर से आऊँगी,  
मिट्टी से किस दिन जाग क्रुद्ध अम्बर में आग लगाऊँगी।’’
कवि की सशक्त हुंकार-वाणी में राष्ट्रीय भावनाओं का पोषण करने के साथ-साथ सामाजिक विषमता के प्रति भी प्रबल आक्रोश है। सच कहा जाए तो राष्ट्रीयता किसी-न-किसी रूप में सामाजिकता से भी जुड़ी हुई है और सामाजिक संदर्भों को नकार कर राष्ट्रीयता के बिगुल-वादन से उसकी सम्पूर्णता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। यही कारण है कि राष्ट्रीयता के उदात्त स्वर में यत्र-तत्र ‘दिनकर’ की रचनाओं में सामाजिक वैषम्य का नग्न-चित्रण एवं उसके प्रति प्रबल आक्रोश भी दिखलाई पड़ता है। ‘हाहाकार’ कविता में कवि इन पंक्तियों के साथ अत्यन्त उग्र रूप में दिखलाई पड़ता है -
‘‘हटो व्योम के मेघ, पन्थ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं, 
‘दूध, दूध’ ओ वत्स ! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं।’’
युग का स्वर भी ‘दिनकर’ की कविताओं में सशक्त रूप से मुखरित हुआ है। विशेषकर ‘सामधेनी’ में राष्ट्रीय परिस्थितियों के प्रति अत्यन्त सजग रहते हुए भी कवि अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश से भी प्रभावित दिखलाई पड़ता है। ‘सामधेनी’ में दिनकर की सन् 1941 से 1946 तक की कविताएँ मुख्यतः संग्रहित हैं और वे रचनाएँ उस समय की हैं जब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध की ‘विभीषिका’ छायी हुई थी और राष्ट्र गुलामी की जंजीरों से मुक्त होने के लिए प्रबल अंगड़ाई ले रहा था। इस राष्ट्रीयता संग्राम के यज्ञ में ‘दिनकर’ की कविताओं ने समिधा का कार्य किया और यज्ञाग्नि को प्रज्वलित करने के लिए जो भी गीत उन्होंने लिखे उन्हें ‘सामधेनी’ से अभिहित किया गया। वेद की वे ऋचाएँ, जो अग्नि प्रज्वलित करने के लिए पढ़ी जाती थीं उन्हें सामधेनी कहा गया है और इस अर्थ में ‘दिनकर’ की ‘सामधेनी’ भी स्वातन्त्रय समर की अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए इस भाव को सार्थकता प्रदान करती है। कवि के शब्दों में --
‘‘सुलगती नहीं यज्ञ की आग, 
दिशा धूमिल, यजमान अधीर; 
पुरोधा-कवि कोई है यहाँ? 
देश को दे ज्वाला के वीर।’’
दिनकर युग-द्रष्टा भी हैं और इनकी जीवन दृष्टि दार्शनिक तटस्थता की नहीं है बल्कि सबल कर्मवाद की है। वे राष्ट्र के नवयुवकों को इसी कर्मवाद से प्रेरित होकर राष्ट्रीय-संग्राम में कूदने का आह्वान करते हैं। कवि के स्वर में नवयुवकों के प्रति एक सबल सन्देश सामधेनी में उभरा है - 
‘‘भुजाओं पर मही का भार फूलों-सा उठाए जा ,
कँपाए जा गगन को, इन्द्र का आसन हिलाए जा।।
जहाँ में एक ही है रौशनी, वह नाम की तेरे,
जमीं को एक तेरी आग का आधार है साथी।।’’
‘आग की भीख’ नामक कविता में देश की पीड़ा को शब्दों में बाँधते हुए दिनकर की कविता आग उगलने लगती हैं, जिसमें एक विस्फोट है, तूफान है -
‘‘हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।’’
‘‘उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ,
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।’’
मगर इसके साथ ही इस विस्फोट की ध्वनि के पास ही कवि आशा का दीप दिखाकर लक्ष्य-प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होने के लिए पथ प्रशस्त करता है। स्वतन्त्रता करीब है, बस थोड़ा और चलना है। मंजिल पर पहुँचने में अब अधिक दूरी नहीं है। ‘सामधेनी’ में कवि आश्वस्त करता है -
‘‘वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है, 
थक कर बैठ गए क्या भाई, मंजिल दूर नहीं है।’’
राष्ट्रकवि दिनकर की कविता में केवल क्रान्ति और विस्फोट ही नहीं है, उसमें जीवन-दर्शन का उदात्त स्वरूप भी है, जिसकी झलक ‘कुरुक्षेत्र’ में विशेष रूप से परिलक्षित होती है। राष्ट्रीय चेतना का भाव-प्रवाह ‘कुरुक्षेत्र’ से पहले लिखी गई शायद सभी कविताओं में किसी-न-किसी रूप में विद्यमान है मगर ‘कुरुक्षेत्र’ में वे एक दार्शनिक और विचारक के रूप में ही प्रतिष्ठित हुए हैं। दिनकर ने अनेक समस्याओं का समाधान पाश्चात्य और भारतीय दर्शन के प्रकाश में ‘कुरुक्षेत्र’ में किया है मगर फिर भी उस समष्टि-चेतना के पाश्र्व में भी राष्ट्रीयता की अनुगूंज किंचित् सुनाई पड़ती है। जो न्याय को चुरा कर अन्याय का समर्थन करता है, वास्तव में युद्ध के लिए वही उत्तरदायी है। ‘कुरुक्षेत्र’ में यह दर्शन उभर कर आता है-
‘‘चुराता न्याय जो, रण को बुलाता भी वही है, 
युधिष्ठिर ! स्वत्व की अन्वेषणा पातक नहीं है।       
नरक उसके लिए, जो पाप को स्वीकारते हैं, 
न उनके हेतु, जो रण में उसे ललकारते हैं।’’ 
‘दिनकर‘ का समाज-धर्म यहाँ भी सोता नहीं है। मानवोचित गुणों का उद्रेक निश्चय ही वरेण्य है मगर जब राष्ट्र और समाज की बात उठती है तब वही सर्वोपरि बन जाता है -
‘‘व्यक्ति का है धर्म, तप, करुणा, क्षमा, 
व्यक्ति की शोभा विनय भी, त्याग भी,
किन्तु, उठता प्रश्न जब समुदाय का,
भूलना पड़ता हमें तप-त्याग को।’’
‘कुरुक्षेत्र‘ लिखने के बाद दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ लिखकर फिर एक बार ज्वलन्त सामाजिक प्रश्नों को उठाकर युगबोध को मुखर स्वर प्रदान किया है। इसकी भूमिका में कवि ने लिखा है- ‘‘यह युग दलितों और उपेक्षितों के उद्धार का युग है। कर्ण-चरित के उद्धार की चिन्ता इसका प्रमाण है कि हमारे समाज में मानवीय गुणों की पहचान बढ़ने वाली है। कुल और जाति का अहंकार विदा हो रहा है।’’ इस नग्न सत्य को कवि ‘रश्मिरथी‘ में इस प्रकार प्रकट करता है- 
जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषण्ड। 
मैं क्या जानूँ जाति? जाति हैं ये मेरे भुजदण्ड।।’’
कर्ण के चरित्र के माध्यम से कवि ने समाज के तिरस्कृत एवं उपेक्षित व्यक्तियों के सामने एक आदर्श रखने का प्रयास किया है जिसमें व्यक्ति का चरित्रबल एवं कर्म-गुण ही प्रधान होंगे -
‘‘मैं उनका आदर्श, किन्तु जो तनिक न घबरायेंगे ।
निज चरित्रा-बल से समाज में पद विशिष्ट पायेंगे।।’’
कवि का दृष्टिकोण मानवतावादी होते हुए भी व्यक्ति के अन्दर छिपी शक्ति को जगाने की प्रेरणा देता है, जिसमें पुरुषार्थ का आह्वान है। 
‘‘मुसीबत को नहीं जो झेल सकता,
निराशा से नहीं जो खेल सकता,
पुरुष क्या, शृंखला को तोड़ करके,
चले आगे नहीं जो जोर करके।’’
‘दिनकर’ राष्ट्रीयता के गायक हैं मगर इसका यह अर्थ नहीं कि उनकी विश्व-प्रेम से सनी मानवतावादी दृष्टि नहीं है। कुछ विद्वान् यह मानते हैं कि दिनकर का विचार-दर्शन दुविधा से ग्रस्त है और शुद्ध कविता की जगह सामयिक प्रवाह का प्रभाव उनपर अधिक है। मगर सत्य यह है कि कोई भी किसी विचार के खूँटे से सदैव बँधा नहीं रहता है, समय की नब्ज पर भी उसकी पकड़ होती है। विश्व-बन्धुत्व और जीवन की सरलता के प्रति वह अनभिज्ञ नहीं रहता है। यही कारण है कि दिनकर के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में एक बार श्री रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा था-‘‘अंगारे जिस पर इन्द्रधनुष खेल रहे हैं। रेणुका, हुंकार, सामधेनी, कुरुक्षेत्र और रश्मिरथी में दहकते अंगारों का तेज है। इन्द्रधनुषी रंग रसवन्ती में छिटका था। उर्वशी में वह मध्याह्न सूर्य के उभार पर पहुँच गया है।’’
यह बात दूसरी है कि दिनकर की कविताओं में क्रांति का स्वर प्रधान है। स्वयं कवि ने ‘चक्रवाल’ की भूमिका में इसे स्वीकार किया है - ‘‘मैं समय का पुत्र हूँ और मेरा सबसे बड़ा कार्य यह है कि मैं अपने युग के क्रोध और आक्रोश को, अधीरता और बेचैनी को सबलता के साथ छन्दों में बाँध कर सबके सामने उपस्थित कर दूँ। मेरे पीछे और मेरे चारों ओर भारतीय मानवता खड़ी थी जो पराधीनता के पाश से छूटने को बेचैन थी।’’ और यही कारण है कि देश जब स्वतन्त्र हो गया तब दिनकर की कविताओं के स्वर में कुछ बदलाव स्पष्ट दिखलाई पड़ने लगा। यहाँ तक कि स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद राष्ट्रीयता का उपयोग समाप्त हो गया है, यह भाव ‘राष्ट्रदेवता का विसर्जन’ कविता में स्पष्ट परिलक्षित है-       
     
‘‘खण्ड-प्रलय हो चुका, राष्ट्रदेवता! सिधारो,
क्षीरोदधि को अब प्रदाह जग का धोने दो,
महानाग फण तोड़ अमृत के पास झुकेगा, 
विषधर पर आसीन विष्णु-नर को होने दो।।’’
‘किसको नमन करूँ मैं’ कविता में भारत के जिस रूप को कवि ग्राह्य मान रहा है, वह भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत मानवतावादी चिन्तन का भारत है।
‘‘भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है,
एक देश का नहीं, शील यह भू-मण्डल भर का है।
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है,
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्वर है।’’
देश की आजादी के बाद दिनकर को जिस भारत की आशा बनी थी उनका वह उत्साह भंग जब होने लगा तो कवि की वाणी एक बार फिर किसी विप्लवी विस्फोट की अभिव्यक्ति बनने लगी -- 
‘‘वज्र की दीवार जब भी टूटती है,
नींव की यह वेदना विकराल बनकर छूटती है। 
दौड़ता है दर्द की तलवार बनकर,
पत्थरों के पेट से नरसिंह ले अवतार।
काँपती है वज्र की दीवार।
- ख्नींव की हाहाकार , 
यही नहीं बल्कि जिस गाँधी ने सत्य और अहिंसा से स्वतन्त्रता लायी उसी के सम्बन्ध में कवि एक विस्फोटक संकेत देता है -
‘‘हठी! तुम्हारे पापों से 
फिर एक प्रलय छाने वाला है,
गाँधी ने भचाल किया 
तूफान वही लाने वाला है।’’
-काँटों का गीत,

स्वराज्य-प्राप्ति के पूर्व दिनकर राष्ट्रीयता से बँधे नजर आते है मगर देश की आजादी के बाद उनका चिन्तन मानवतावादी और भारतीय संस्कृति के गुणों से ओत-प्रोत दिखलाई पड़ता है जिसमें युद्ध की नहीं बल्कि शान्ति की गुहार है। कवि की यह यात्रा शायद और लम्बी होती मगर देश पर चीनी आक्रमण के समय उत्पन्न जनता की क्रोध की ज्वाला को पीना क्रान्तिकारी कवि के लिए असह्य हो उठा और उस जनाक्रोश की आग को दिनकर ने कविता में बाँध कर एक बार फिर राष्ट्रीयता की गुहार का प्रबल वेग से ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में हुंकार किया। भारत का जन-मन जिस पराजय की पीड़ा से फुफकार उठा था और उसकी भावनाएँ जिस प्रकार आहत हुई थीं उसे कविता में बाँधना ‘दिनकर’ जैसे राष्ट्रीय कवि के ही वश की बात थी। एक बार फिर दिनकर की कविताओं में क्रान्ति का स्वर प्रधान हो उठा और राष्ट्रीयता पुनः समय की पुकार बन गई। राष्ट्र के हृदय में उठती बेचैनी और कसमसाहट को कवि ने एक प्रश्न के रूप में उछाला है -
‘‘गरदन पर किसका पाप वीर, ढोते हो,
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?’’
और इस प्रश्न का उत्तर भी ज्वालामुखी के लावे की तरह फूट पड़ता है और सीमा पर हारा हुआ सिपाही इस दास्तान को कारुणिक भाव से, मगर रोषपूर्वक प्रकट करता है -
गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पड़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं। 
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का।    
सारी वसुन्धरा में गुरुपद पाने को ,
प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को,   
जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे, 
अच्छे हैं अब, पहले भी बहुत भले थे। 
                                                       हम उस धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,                                                          शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।’’ 
एक सिपाही के माध्यम से देश की पराजय के कारणों का विश्लेषण करते हुए कवि की दृष्टि व्याप्त भ्रष्टाचार, कदाचार और शासकों की अकर्मण्यता पर विशेष रूप से केन्द्रित होती है। फौजी देश को विजय अवश्य दिलायेगा मगर शासकों को भी स्वच्छ प्रशासन और देशवासियों को अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए सम्बद्ध रहना होगा। ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में कवि का आक्रोश उग्र हो उठा है -
‘‘हम देंगे तुमको विजय, हमें तुम बल दो 
दो शस्त्रा और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में 
हो जहाँ कहीं भी अनय उसे रोको रे ! 
यदि करे पाप शशि-सूर्य उन्हें टोको रे!
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को 
निर्बन्ध पंथ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा
अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।’’
कवि की ललकार एक बार फिर प्रलयंकर हो उठी है जब वह आह्वान करता है -
‘‘जातीय गर्व पर क्रूर प्रहार हुआ है, 
माँ के किरीट पर ही यह वार हुआ है। 
अब जो सिर पर आ पड़े, नहीं डरना है,
जनमें हैं तो दो बार नहीं मरना है।’’
यहाँ भारत का इतिहास एक बार करवट लेता हुआ दिखलाई पड़ता है। फिर हमारी शान्ति और धर्म-नीति हमें पराजय के द्वार पर घसीट लायी है। हमें फिर से भारत के बाहुबल को अपना आदर्श  बनाना होगा और केवल आत्मिक चिन्तन की प्रवंचना से अपने को मुक्त करना होगा। तभी यह देश अजेय बना रहेगा और हम जो चाहेंगे वह करने में सक्षम हो सकेंगे, इस आशय को स्पष्ट करते हुए कवि कहता है -
‘‘बाहों से हम अंबुधि अगाह थाहेंगे,
धँस जायेगी यह धरा, अगर चाहेंगे।
तूफान हमारे इंगित पर ठहरेंगे,
हम जहाँ कहेंगे मेघ वहीं घहरेंगे।’’ 
कवि समाज के हर वर्ग को ललकारता है। कवि चिन्तक, योगी, यती, संन्यासी, किसान, मजदूर, राजा, व्यापारी सभी को रण में आने का आमंत्रण देता है। और इस परिस्थिति में आपद्धर्म का पालन करने एवं राष्ट्र-रक्षा के निमित्त विजय-मार्ग का अनुसरण करने के लिए उनसे उपेक्षा भी रखता है। कवि सबका आह्वान करते हुए ललकार उठता है -
‘‘चिन्तको, चिन्तना की तलवार गढ़ो रे! 
ऋषियो, कृशानु-उद्दीपन मंत्र पढ़ो रे!
योगियो जगो, जीवन की ओर बढ़ो रे!
बन्दूकों पर अपना आलोक मढ़ो रे! 
है जहाँ कहीं भी तेज हमें पाना है! 
रण में समग्र भारत को ले जाना है!’’
इस राष्ट्र-धर्म की रक्षा के लिए आने वाला देवता ही परशुराम का प्रतीक है, जिसके एक हाथ में परशु और दूसरे में कुश है। वास्तव में यह ‘परशुराम’ एक विचारधारा का प्रतीक है जो राष्ट्रीयता से ओतप्रोत है और जिसका आगमन कवि को इस संकट की बेला में अभीष्ट है। राष्ट्रीय अपमान की रक्षा के लिए भारत में जन-जन के हृदय में जो तेज और शक्ति प्रकट होगी उसी के सम्मिलित रूप का नाम ‘परशुराम’ होगा। यही भारत का नया भाग्य-पुरुष बनेगा जो देश के स्वाभिमान के लिए मरने-मिटने को तैयार रहेगा।
‘‘गाओ, कवियो जयगान, कल्पना तानो,
आ रहा देवता जो, उसको पहचानो।
है एक हाथ में परशु, एक में कुश, 
आ रहा नये भारत का भाग्य-पुरुष।’’
दिनकर की राष्ट्रीयता ‘‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में बहुत उग्र हो उठती है। जब वे ‘अशोक’ और ‘गौतम बुद्ध’ को भी युद्ध के समर्थन में कुछ बोलने को मजबूर करते हुए कहते हैं -
‘‘पर्वत-पति को आमूल डोलना होगा, 
शंकर को ध्वंसक नयन खोलना होगा,
असि पर अशोक को मुंड तोलना होगा, 
गौतम को जय-जयकार बोलना होगा।’’
वस्तुतः दिनकर की राष्ट्रीयता में एक महत्त्वपूर्ण दर्शन है और वह है उन भेड़ियों के लिए सबक सिखाने का जो अकारण ही किसी राष्ट्र के कंधों पर अपने पैने दाँत गड़ाने लगते हैं। जो विश्व-जनमत का भी आदर नहीं करते और अपने खूनी पंजों से शान्ति के पुजारी देश को भी आहत कर बैठते हैं। ऐसे जालिम लोगों के लिए देश को उग्र राष्ट्रवाद की ही जरूरत है जो इन दुश्मनों के खून से होली खेलने का संकल्प जगा सके और उनके रक्त से जननी जन्म-भूमि का शृंगार कर सके। इसीलिए तो कवि मात्र एक ही पंथ की ओर इंगित करता है-
‘‘एक ही पंथ, तुम भी आघात हनो रे।
मेषत्व छोड़ मेषंो, तुम व्याघ्र बनो रे। 
एक ही पंथ अब भी जग में जीने का। 
अभ्यास करो छागियों रक्त पीने का।’’ 
कुछ विद्वान् यह मानते हैं कि इन पंक्तियों के माध्यम से दिनकर ने हिंसा को प्रतिष्ठित किया है और मानवतावाद को इससे ठेस पहुँची है। मगर यह एकांगी चिन्तन है। दिनकर का दृष्टिकोण इस संदर्भ में बिल्कुल साफ है जिसे कुरुक्षेत्र में भी जो मानवतावादी दर्शन का काव्य है उन्होंने स्पष्ट कहा है -

‘‘छीनता हो स्वप्न कोई, और तू, 
त्याग तप से काम ले यह पाप है। 
पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे, 
बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है।’’

‘चक्रवाल‘ में कवि के जो तेवर थे उसका दर्शन ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में और घनीभूत दिखलाई पड़ता है। ‘चक्रवाल’ की ‘दिगम्बरी’ कविता में तो कवि ईश्वर को भी चुनौती देते हुए इस सामाजिक विषमता के प्रति अत्यन्त उग्र आक्रोश अभिव्यक्त करता है --
‘‘जरा तू बोल तो सारी धरा हम फूँक देंगे, 
                                पड़ा जो पंथ में गिरि; कर उसे दो टूक देंगे।                              
कहीं कुछ पूछने बूढ़ा विधाता आज आया, 
कहेंगे हाँ तुम्हारी सृष्टि को हमने मिटाया।’’
जो कवि ईश्वर को भी सामाजिक अन्याय के लिए क्षमा नहीं कर सकता वह भला विदेशी आक्रमण को कैसे बर्दाश्त कर सकता है? यही कारण है कि दिनकर के लिए आदर्श गढ़ना लक्ष्य नहीं है और न वे किसी आदर्श की आड़ में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति के इच्छुक हैं बल्कि वे राष्ट्रीय समस्या के लिए एक  जुझारू योद्धा के रूप में ही अपनी पहचान छोड़ जाते हैं। दिनकर ने जो कुछ भी लिखा उसमें सूर्य का तेज है, राष्ट्र के जागरण का मंत्र है और  सर्वत्र विजय का सिंहनाद है। कुल मिलाकर यही दिनकर का परिचय भी बन गया है। इसलिए ‘उर्वशी’ जैसे शृंगारिक कार्य में भी कवि अपने परिचय का एक प्रतीकात्मक सूत्र छोड़ जाता है - 
‘‘मर्त्यमानव की विजय का तूर्य हूँ मैं,
उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूँ मैं। 
अन्धतम के भाल पर पावक जलाता हूँ, 
बादलों के सीस पर स्यन्दन चलाता हूँ।’’
दिनकर के साहित्य में यद्यपि अनेक भावों का मिश्रण है मगर राष्ट्रीयता का स्वर सर्वाधिक मुखर है। यह बात भी सही है कि राष्ट्रीयता की भाव-धारा के आस-पास ही अन्य भाव-रस भी कवि के हृदय में हिलोरें लेते प्रतीत होते हैं। विद्वान् लेखक शिवसागर मिश्र ने इस सम्बन्ध में कहा है- ‘‘उनके साहित्यिक दृष्टिकोण में अनेक भावों का सम्मिश्रण है। वास्तव में दिनकर जी ने आरम्भ से ही हिमालय के साथ-साथ गंगा, युधिष्ठिर के साथ-साथ रसवन्ती, धर्म के साथ-साथ नीलकुसुम और भीष्म पितामह के साथ-साथ उर्वशी के सपने देखे थे। एक सम्पूर्ण मनुष्य में जितने भी रस हो सकते हैं, दिनकर जी में वे सभी रस हिलकोरे लेते रहे। सम्पूर्ण साहित्यिकता को अपने में समेटे दिनकर कभी काल-युक्त रचनाओं से जुड़े तो कभी काल-मुक्त शाश्वत काव्य-कला के पास खड़े दिखलाई पड़ते हैं। यह वैविध्य ही दिनकर की विशेषता बन गया है।’’ 
दिनकर की कविताओं में राष्ट्र-वन्दना का स्वर है, अतीत का गौरव-गान है, नवनिर्माण का आह्वान है, क्रान्ति का उद्बोधन है, प्रगति की कामना है, आदर्शों के प्रति सजगता है, युग-चेतना का शंखनाद और युग-धर्म की आवाज है तथा सबसे बढ़कर राष्ट्रीयता का प्रबल उत्स है। डाॅ0 पुष्पा ठक्कर के शब्दों में-‘‘वास्तव में, दिनकर की कविता युगवाणी के रूप में स्वीकृत हुई और वे युग-कवि के रूप में मान्य हुए। वे युग-कवि हैं, समकालीन जीवन के कवि हैं, जन-जीवन के कवि हैं, धरती और धूल के कवि हैं, ज्वाला और तूफान के कवि हैं। यह ‘ज्वाला और तूफान’ दिनकर जी के स्वाभिमानी व्यक्तित्व का पर्याय-सा प्रतीत होने लगता है और यही कारण है कि राष्ट्र की गौरव-गरिमा जहाँ भी खंडित होती दिखलाई पड़ती है, कवि की ओजपूर्ण वाणी राष्ट्र के ठंडे रक्त को खौलाने का कार्य करने लगती है। दिनकर की काव्य-चेतना राष्ट्रीयता से भरी पड़ी है मगर लोक-मंगल की भावना से भी अभिभूत है। दिनकर की राष्ट्रीयता किसी संकीर्णता की परिधि में कैद नहीं है बल्कि विश्व-मानवता के लिए भी प्रेरणा का संदेश देने वाली है जिससे कवि को सर्वत्र प्रसिद्धि मिली है। कुल मिलाकर राष्ट्रीयता ही दिनकर के काव्य का शक्ति-केन्द्र बन गई है और वे राष्ट्रीयता के अमर गायक बन गए हैं । 
अन्त में अपनी स्वरचित कुछ पंक्तियों से उस राष्ट्रकवि का अभिनन्दन करते हुए इस लेख का समापन करता हूँ -
जिसकी कविता है धधक रही लेकर अक्षर ज्योति ललाम। 
उस राष्ट्रकवि के अग्नि-तेज को, है सादर शतशः प्रणाम।। 
हिन्दी-नभ में वह उदित हुआ, 
क्षितिज का चमका प्राच्य छोर; 
जिस ओर चरण वह डाल दिया
दब गया वहीं अम्बर-भूगोल। 
वाणी में ताप्तांगार लिये, 
शोणित में उसको दिया घोल; 
उस अक्षर की जो आग चली, 
जल उठी धरा, जल उठा व्योम।। 
जिसकी कविता द्युति दीपक से है, दीप्त राष्ट्र का हृदय-प्राण। 
उस राष्ट्रकवि के अग्नि-तेज को, है सादर शतशः प्रणाम।। 
बारदोली विजय से जो उभरा, 
रेणुका में भर जीवन का स्वर, 
रश्मिरथी, नीलकुसुम चढ़कर,
चमका बन काव्य गगन दिनकर। 
उन्मुक्त हृदय के मुक्त गीत, 
सब सामधेनी में गये सँवर, 
उज्ज्वल अतीत के स्वर्ण पृष्ठ, 
फिर कुरुक्षेत्रा में हुए मुखर।। 
सूरज का ब्याह रचा डाला चित् चक्रवाल चिन्तन उद्दाम। 
उस राष्ट्रकवि के अग्नि-तेज को, है सादर शतशः प्रणाम।। 
रसवंती पावन प्यार दिया, 
शुचि राष्ट्रधर्म हुंकार किया, 
रच परशुराम की प्रतीक्षा, 
अध कायर नीति कुठार किया। 
उर्वशी की पायल छम-छम में, 
धरती पर स्वर्ग उतार दिया। 
संस्कृति के चार अध्याय रचे
जीवन-दर्शन का सार दिया।।
जो हारे को हरिनाम दिया, जाने के पहले पुण्य धाम। 
उस राष्ट्रकवि के अग्नि-तेज को, है सादर शतशः प्रणाम।। 
रचना में उजली आग लिये, 
रेती के फूल अध खुले अधर, 
नयी काव्य भूमिका में गूंजित
कवि कर्म-चमन के सरस भ्रमर। 
सांस्कृतिक एकता यह अनेकता 
में एकता का सात्विक स्वर, 
है शुद्ध कविता की खोज वहाँ, 
जहाँ भाव छन्द बन हुए मुखर।। 
हिन्दी-नभ आँगन में गूँजित जिसकी रचना का सरस गान।
उस राष्ट्रकवि के अग्नि-तेज को, है सादर शतशः प्रणाम।। 
वह देशभक्ति का प्रभा-पुंज, 
वह राष्ट्रशक्ति का उद्गाता, 
धर समय-शिला पर चरण-चिह्न 
बन गया सूर वह युग-द्रष्टा। 
हो उठा व्योम विहँसित पाकर 
निज अंक धरा का वह सविता,
रो उठा देश खो कवि-मनीषी
हिन्दी-साहित्य सुधी-स्रष्टा।। 
हो गया तिरोहित भले काय, पर अमर धरा कीरति महान्। 
उस राष्ट्रकवि के अग्नि-तेज को, है सादर शतशः प्रणाम।। 
उस अग्नि-कवि को जिस पर इन्द्रधनुष की छाया थी, जो राष्ट्रीयता के अमर स्वर थे, उन्हें कोटिशः नमन!


Article source from Apani Maati Apana Chandan, Author- Sukhnandan Singh Saday. Keywords- Ramdhari Singh Dindak, Biography of Ramdhari singh Dinkar, Who is Ramdhari, Ramdhari ji kon the. Dinkar, Deenkar ji, Kavi samrat, kavi Ramdhari Singh Dinkar. रामधारी सिंह दिनकर, कवि रामधारी सिंह दिनकर.

वीर सुभाषचन्द्र बोस | VEER SUBHASH CHANDRA BOSE

 तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा -

 वीर सुभाषचन्द्र बोस

 
 
देश की आजादी के इतिहास में एक नाम जिसको सुनते ही भुजाएँ फड़कने लगती हैं, शिराओं में रक्त का उबाल होने लगता है, मस्तिष्क में राष्ट्रभक्ति के उफान का संगीत तड़ित की ज्योति बनकर धड़कने लगता है और हृदय में देश-प्रेम की पुकार हिलोरें लेने लगती हैं, तो वह नाम है, सर्वप्रथम स्वतंत्रता के लिए युद्ध का शंखनाद करने वाले महान् सेनानी सुभाषचन्द्र बोस का। सुभाष बाबू राष्ट्रीय संग्राम में सिंह-गर्जन करने वाले प्रथम योद्धा हैं जिन्होंने विदेश की भूमि से देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान करने वालों का आह्वान करते हुए कहा था- ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’’ आज भी नेताजी की वह शौर्यपूर्ण वाणी हमारे कानों में गूँज रही है। सच पूछें तो नेताजी ज्वलंत देश-भक्ति की प्रचंड ज्वाला के पर्याय थे और ‘हम करें राष्ट्र आराधन’ की शाश्वत-साधना की मूत्र्त-ध्वनि थे।
 
स्वतंत्रता के ऐसे महान् सेनापति सुभाषचन्द्र बोस का जन्म उड़ीसा के कोडोलिया नामक ग्राम में 23 जनवरी 1897 को हुआ था। पिता रायबहादुर जानकीनाथ बोस कटक मुनिसिपालिटी तथा जिला-बोर्ड के प्रधान अधिकारी के साथ-साथ वहाँ के जाने-माने प्रतिष्ठित वकील भी थे। पूजनीया माता श्रीमती प्रभा देवी भी एक विदुषी महिला थी। आपके बड़े भाई का नाम शरदचन्द्र बसु था। सुभाष बाबू के बचपन के शिक्षक का नाम बाबू वेणी माधव था। सुभाष बाबू जब बच्चे थे, उस समय स्वामी विवेकानन्द विश्व-विजेता बनकर हिन्दूधर्म और सनातन संस्कृति का डंका विश्व के रंगमंच पर बजा चुके थे। स्वामी विवेकानन्द की वाणी में भारतीय राष्ट्र का आभा-मंडल और हिन्दूधर्म का ओज-तेज अपनी गौरवशाली संस्कृति की पूर्ण प्रभा के साथ सारे विश्व को आन्दोलित कर रहा था। इसी संदर्भ में एक दिन जब बालक सुभाष से उनके पिताजी ने पूछा कि तुम्हारे आदर्श कौन हैं? उस दिन सुभाष ने सीना तानकर गर्व से कहा- ‘‘मेरे आदर्श स्वामी विवेकानन्द हैं।’’
 
वह बालक अब धीरे-धीरे वयस्कता की ओर बढ़ने लगा और उसके जीवन में भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभक्ति के ओज-तेज उभरने लगे। केवल 18 वर्ष की अवस्था में पे्रसीडेन्सी काॅलेज कलकत्ता में बी0ए0 आनर्स में प्रवेश और वहाँ से दर्शनशास्त्र में स्नातक प्रतिष्ठा में उत्तीर्ण होकर सन् 1919 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, लन्दन में उनका दाखिला हुआ। लन्दन की शिक्षा में उत्कृष्टता के साथ उत्तीर्ण होने के बाद सन् 1920 में आई0सी0एस0 (I.C.S) की परीक्षा में बैठे। भारत के इस तेजस्वी युवा ने लन्दन में आयोजित I.C.S की परीक्षा में सन् 1920 में चतुर्थ स्थान प्राप्त करके सबको चकित कर दिया। उस समय I.C.S बनना बड़े गर्व की बात मानी जाती थी। मगर इस भारतीय युवा को कुछ और बनना था। 

आई0सी0एस0 पद इनके व्यक्तित्व के लिए छोटा पड़ रहा था। उसी समय भारत में असहयोग आन्दोलन की शुरुआत होने जा रही थी। युवा सुभाष का हृदय देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लेने के लिए मचल रहा था। अन्ततः देशभक्ति के सामने आई0सी0एस0 का पद हार गया और सुभाष बाबू ने 22 अप्रैल 1921 को आई0सी0एस0 के पद से त्यागपत्र दे दिया। भारत माता अपने इस सपूत को बुला रही थी और उसकी करुण-आवाज को सुनकर सुभाष बाबू देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लेने के लिए भारत आ पहुँचे। उस समय बंगाल के महान् नेता देशबन्धु चितरंजन दास थे। उन्होंने सुभाष बाबू की तेजस्विता को पहचाना और बंगाल में स्वतंत्रता-संग्राम के लिए कार्यरत स्वयंसेवक-सेना का इन्हें सेनापति नियुक्त कर दिया। 

आखिर एक दिन इस स्वयंसेवक-सेना के सेनापति को ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता-संग्राम का प्रथम प्रधान सेनापति भी तो बनना था। अंग्रेजों का अत्याचार उस समय चरम पर था। सुभाष बाबू स्वयंसेवक-सेना के सेनापति के रूप में अंगे्रजों के विरुद्ध लड़ी जाने वाली लड़ाई में देशबन्धु के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रहे थे। इसी समय 10 दिसम्बर 1921 को देशबन्धु के साथ सुभाष बाबू भी गिरफ्तार कर लिये गए। पहली बार ब्रिटिश सरकार के न्यायाधीश ने उन्हें छः महीने की सजा सुनाई और तब उन्होंने मजिस्ट्रेट से निर्भीक भाव से कहा था- ‘केवल छः महीने की सजा?’
 
सुभाष बाबू सन् 1922 में जेल से छूटकर आये। उसी वर्ष कांग्रेस पार्टी का सैंतीसवाँ अधिवेशन कलकत्ता में हुआ। इस अधिवेशन में पं0 मोतीलाल नेहरू और देशबन्धु चितरंजन दास ने कई विषयों पर कांगे्रस से असहमति जताते हुए ‘स्वराज पार्टी’ की स्थापना की। सुभाष बाबू भी देशबन्धु के साथ ही रहे। वे उन्हें अपना मार्गदर्शक मानने लगे थे। इसके बाद सन् 1924 के नगरपालिका चुनाव में जहाँ देशबन्धु मेयर चुने गए वहीं सुभाष बाबू महापालिका के कार्यकारी अधिकारी। इस समय सुभाष बाबू की अवस्था मात्र 27 वर्ष की थी।
 
सुभाष बाबू की भूमिका राष्ट्र के स्वतंत्रता-संग्राम में बढ़ती जा रही थी और अंग्रेजों की आँखों में वे खटकने लगे थे। सन् 1924 के अन्त में ही उन्हें फिर जेल-यात्रा करनी पड़ी। इस बार बर्बर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें दो वर्ष से भी अधिक जेल में बन्द रखा। इस बार जेल में रहते ही उन्हें यह मर्मान्तक सूचना मिली कि देशबन्धु चितरंजन दास का निधन (1925 में) हो गया है। जब 16 मई 1927 को वे जेल से छूटकर आए तो अपने अभिभावकतुल्य मार्गदर्शक नेता देशबन्धु की याद में मर्माहत हो उठे। अब पं0 मोतीलाल नेहरू भी फिर से कांग्रेस में आ गए थे। इसी क्रम में सन् 1928 के दिसम्बर माह में आयोजित कांग्रेस के पैंतालीसवें अधिवेशन में पं0 मोतीलाल नेहरू अध्यक्षता किए। इसी अधिवेशन में महात्मा गाँधी द्वारा प्रस्तुत एक प्रस्ताव में सुभाष बाबू ने संशोधन प्रस्ताव रखा था जो 1350 के मुकाबले 973 मतों से गिर गया। मगर सुभाष बाबू को इस अधिवेशन से अपार ख्याति मिली। अब वे कांग्रेस के भीतर क्रान्तिकारी विचारधारा के प्रबल पक्षधर माने जाने लगे। अंग्रेजों के कान इस महान् क्रान्तिकारी नेता के विरोध में खड़े होने लगे। जब 23 जनवरी को ये अपना चैंतीसवाँ वर्षगाँठ (33 वर्ष पूरा होने पर) मनाने की तैयारी कर रहे थे, उसी दिन 23 जनवरी 1930 को इन्हें पुनः बन्दी बना लिया गया और इस बार एक वर्ष की सजा सुनायी गई। स्वतंत्रता-संग्राम का यह कालजयी पुरुष बार-बार की जेल-यात्रा से जरा भी भयभीत नहीं हुआ और अंग्रेजों के विरुद्ध उसकी लड़ाई के सुर और भी गहरे होते गए। देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने के वे पक्षधर थे।
 
सन् 1931 में गाँधी-इरविन समझौता होने वाला था। सुभाष बाबू ने इस समझौते का मुखर विरोध किया। इसके पीछे कारण था कि 8 अप्रैल 1929 को लाहौर लेजिस्लेटिव एसेम्बली में बम फेंकने के आरोप में महान् क्रान्तिकारी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को फाँसी की सजा सुनायी गई थी। देश के क्रान्तिकारी विचारधारा वाले नेता चाहते थे कि गाँधी-इरविन वात्र्ता में इसे भी एक मुद्दा बनाकर उन क्रान्तिकारियों की रिहा की बात की जाय। दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका। सुभाष बाबू के प्रखर विरोध के बावजूद भी गाँधी-इरविन पैक्ट हो गया। सुभाष बाबू का क्रान्तिकारी भाषण अंगे्रजों को असह्य हो रहा था। 

अंग्रेजी सरकार ने क्षुब्ध होकर 2 जनवरी 1932 को उन्हें फिर हिरासत में ले लिया। इस बार सुभाष बाबू का स्वास्थ्य बार-बार की जेल-यात्रा से गिरने लगा। वे अत्यन्त कमजोर हो गए। इधर सुभाष बाबू के स्वास्थ्य में गिरावट का समाचार मिलते ही देशवासियों का आक्रोश फूट पड़ा। ब्रिटिश सरकार भी सकते में आ गई। ब्रिटिश सरकार उन्हें चिकित्सा के लिए 13 फरवरी 1933 को विलायत ले गई। कुछ दिन वेनिस में चिकित्सा के उपरान्त फिर स्विटजरलैंड भेजे गए। सुभाष बाबू का हृदय देश की आजादी के लिए बेचैन हो रहा था। इसी बीच एक मर्मान्तक घटना घटी। उनके पिता श्री जानकीनाथ बसु की तबीयत बहुत खराब हो गई। पिता के दर्शन के लिए ब्रिटिश-सरकार उन्हें 4 दिसम्बर 1934 को भारत लायी। पिता ने एक बार उनकी आँखों में देखा और फिर महाप्रयाण कर गए। सुभाष बाबू का हृदय विदीर्ण हो गया। 

जालिम ब्रिटिश-सरकार इस अवस्था में भी उन्हें नजरबन्द बनाए रखी। पिता के श्राद्ध के पश्चात् उन्हें फिर भारत से 10 जनवरी 1935 को ब्रिटेन के लिए रवाना कर दिया गया। आखिर उनके गिरते स्वास्थ्य के चलते उनका एक आॅपरेशन भी किया गया। इस बार कुछ स्वस्थ होने पर उन्हें ब्रिटिश-सरकार ने भारत भेजा और 8 अप्रैल 1936 को बम्बई में उनका आगमन हुआ। भारत की जनता उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ी। लाखों लोगों की भीड़ ने अपने इस अप्रतिम योद्धा का दर्शन किया। ‘सुभाष बाबू जिन्दाबाद’ के गगन-भेदी नारों से वातावरण गुंजायमान हो उठा। अंग्रेज-सरकार सुभाष बाबू के इस सम्मान से और बौखला गई। 

सुभाष बाबू फिर जेल में डाल दिए गए। जनता का आक्रोश उबल पड़ा। देशभर में 10 मई 1936 को सुभाष बाबू की रिहाई के लिए ‘सुभाष दिवस’ मनाया गया। तत्कालीन कांग्रेस पे्रसिडेंट पं0 जवाहर लाल नेहरू ने भी इस आह्वान में अपना योगदान दिया। सारे देश में सुभाष बाबू की रिहाई के लिए आन्दोलन जाग उठा। अन्ततः अंग्रेज-सरकार को झुकना पड़ा और 10 मार्च 1937 को सुभाष बाबू को रिहा कर दिया गया। सुभाष बाबू अब जनता की आवाज बन चुके थे। लाखों लोग उनके क्रान्तिकारी कदम के साथ कदम मिलाकर चलने लगे थे। सुभाष बाबू भारत में क्रान्तिकारी विचारधारावालों के एकछत्र-नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। राष्ट्र की युवाशक्ति उनके आह्वान पर हर तरह का बलिदान देने के लिए आगे आ रही थी।
 
राष्ट्रीय फलक पर महात्मा गाँधी कांग्रेस के सर्वोच्च पद पर आसीन थे। मगर सुभाष बाबू उनसे कई विषयों पर खुलकर मतभेद रखते थे। विशेषकर अहिंसा से स्वराज-प्राप्ति के वे धुर विरोधी थे। फिर भी अपने-अपने ढंग से दोनों देश की आजादी के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ रहे थे। इसी बीच कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में 29 जनवरी 1939 को कांग्रेस-अध्यक्ष के चुनाव में वे पट्टाभि सीतारमैया को हराकर अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए। गाँधीजी इस चुनाव में सीतारमैया के पक्षधर थे। इस जीत ने सुभाष बाबू के व्यक्तित्व को और ऊँचा उठा दिया। इधर गाँधीजी ने यह वक्तव्य दे दिया कि सीतारमैया की हार मेरी हार है। देश के कुछ नेताओं पर इस कथन का काफी प्रभाव पड़ा। सुभाष बाबू की जीत को वे लोग गाँधीजी की हार मानने लगे। इस प्रकार की परिस्थिति से अप्रसन्न होकर सुभाष बाबू ने 16 मई 1939 को कांगे्रस-अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और उन्होंने एक नई पार्टी ‘फारवर्ड ब्लाॅक’ के नाम से बनायी। यह पार्टी राष्ट्रवाद की क्रान्तिकारी अभिव्यक्ति बन गई।
 
इधर विश्व की राजनीति में भी हलचल पूरे उबाल पर था। सितम्बर 1939 में ही दूसरा विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो गया था। इस विश्वयुद्ध की आग में कई देश जलने लगे थे। ब्रिटेन भी इस युद्ध की विभीषिका से अपने को बचा नहीं सका। सुभाष बाबू का विचार था कि अंग्रेज इस समय संकट में हैं और यही समय अनुकूल है कि अपनी आजादी की लड़ाई और अधिक तीव्र किया जाय। इसी संदर्भ में उन्होंने सरकार के खिलाफ आन्दोलन छेड़ दिया। लाखों लोग उनके समर्थन में आगे आए। अंग्रेज-सरकार ने बौखलाकर उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया। इस बार सुभाष बाबू जेल में ही अनशन पर बैठ गए। सारा देश उनकी रिहाई के लिए अपना आन्दोलन तीव्र करने लगा। आखिर देश के आक्रोश के सामने एक बार फिर अंग्रेज-सरकार को झुकना पड़ा और दिसम्बर 1940 में सुभाष बाबू को रिहा कर दिया गया।
 
अपने देश में 31 दिसम्बर 1929 को लाहौर-अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता की माँग का प्रस्ताव पारित हो गया था और इसके लिए सारे देश में 26 जनवरी 1930 को स्वाधीनता-दिवस के रूप में मनाया गया था। जनवरी महीना में ही नेताजी का जन्म दिन भी पड़ता है। इसी महीने में ही 16 जनवरी 1941 को देश की आजादी के नाम में एक और अध्याय जुड़ गया, जब इसी दिन रात में अचानक सुभाषचन्द्र बोस कलकत्ता से गायब हो गए। कलकत्ता से धनबाद (अभी झारखंड में) होते हुए वे ‘गोमो’ रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में सवार होकर अपनी क्रान्तिकारी यात्रा पर निकल पड़े। अंग्रेज-सरकार इस अप्रत्याशित समाचार से बौखला गई। कुछ अता-पता नहीं मिल रहा था। अंग्रेज-सरकार के पसीने छूट रहे थे।
 
इधर सुभाष बाबू एक पठान के वेश में अंग्रेजों की आँख में धूल झोंकते हुए पेशावर पहुँच गए। उनकी यह यात्रा अत्यन्त ही रोमांचक और विस्मयकारी थी। वे भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में विदेश का भी सहयोग लेना चाहते थे। उनकी योजना रूस जाने की थी। मगर विश्व-पटल पर परिस्थितियाँ बदल रही थीं। उन्हें रूस के बदले जर्मनी जाना पड़ा और 28 मार्च 1941 को वे बर्लिन पहुँच गए। बर्लिन में ही सुभाष बाबू द्वारा इण्डियन-लीजन की स्थापना की गई। जर्मनी में वे हिटलर से भी मिले। 

भारत की आजादी के लिए वे हर किसी से सहयोग लेना चाहते थे। अभी तक ब्रिटिश-सरकार उनकी खोज में एड़ी-चोटी एक कर रही थी मगर सुभाष बाबू अपने मिशन पर विदेश की धरती पर आगे बढ़ते जा रहे थे। उसी समय तत्कालीन ब्रिटिश भारतीय सेना के अफसर कैप्टन मोहन सिंह के ‘आजाद हिंद फौज’ की स्थापना का प्रस्ताव सुभाष बाबू को भेजा था। उसी समय बैंकाक में सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस ने भी ‘इंडियन इंडिपेंडेंट लीग’ की स्थापना की थी। आखिर 1 सितम्बर 1942 को सुभाष बाबू के द्वारा ‘आजाद हिन्द फौज’ की विधिवत् स्थापना की गई, जिसमें 19300 सैनिकों के एक डिविजन का गठन किया गया। इसके बाद 3 जून 1943 को सुभाष बाबू बर्लिन से टोकियो के लिए रवाना हुए। जापान-सरकार ने उनके मिशन में पूर्ण सहयोग देने का वादा किया। रासबिहारी बोस ने उनका हृदय से स्वागत किया। फिर भारत की आजादी के लिए अलख जगाते हुए वे टोकियों से सिंगापुर आ गए। 

सिंगापुर में 5 जुलाई 1943 को आबिद हुसेन के साथ मिलकर सुभाष बाबू ने ‘आजाद हिन्द फौज’ की शाखा के गठन की विधिवत् घोषणा की। इसी क्रम में 22 जुलाई 1943 को ‘झाँसी रानी रेजीमेंट’ का गठन हुआ। सुभाष बाबू ने अचानक एक दिन सिंगापुर रेडियों पर घोषणी की- ‘मैं सुभाष बोल रहा हूँ। सिंगापुर में भारत की अस्थायी सरकार बन चुकी है।’ प्रवासी भारतीयों में अब तक वे नेताजी के नाम से विख्यात हो चुके थे। सारा देश अपने ‘नेताजी’ की आवाज को पहचान चुका था। भारत की आजादी के लिए युद्ध का बिगुल विदेश की धरती से ‘नेताजी’ ने फूँक दिया था। उनकी ‘आजाद हिन्द सेना’ भारत की स्वतंत्रता का ध्वज फहराते हुए भारत की ओर बढ़ती आ रही थी। 

उनकी सेना अप्रतिम शौर्य के साथ भारत में ‘कोहिमा और इम्फाल’ तक अपना विजय ध्वज फहरा चुकी थी। सुभाष बाबू ने ‘आजाद हिन्द रेडियो’ से बोलते हुए कहा- ‘‘भारत की स्वतंत्रता का आखिरी युद्ध शुरू हो चुका है’’ और यह भारत के लोगों के लिए मंत्रवाक्य बन गया था। नेताजी के नाम पर अनेक गीत और नारे हवा में लहरा चुके थे। देश के कदम आजादी की राह पर बढ़ चले थे। नेताजी जापान की धरती से इस स्वतंत्रता-संग्राम की अगुआई कर रहे थे।
 
इधर विश्व में घटना-चक्र का परिदृश्य बड़ी तेजी से बदल रहा था। जर्मनी और जापान अलग-थलग पड़ गए थे। नेताजी का सपना पूरा होने के पहले ही जापान इस विश्वयुद्ध में हारने लगा था। अमेरिका एटम-बम से आक्रमण पर उतारू हो गया था। अन्ततः 5 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर अमेरिका द्वारा एटम-बम गिरा दिए गये। भयंकर जान-माल की हानि हुई। जापान को पराजय का मुँह देखना पड़ा। अमेरिका द्वारा अणु-युद्ध का यह प्रथम प्रयोग था। जापान इस अमानवीय अणु-बम के आघात से बुरी तरह आहत हो गया था। अब नेताजी का जापान में रहना खतरे से खाली नहीं था। भारत का भाग्यचक्र एक बार फिर आहत हो उठा।
 
कहा जाता है कि 16 अगस्त 1945 को नेताजी का जहाज रंगून से अज्ञात दिशा की ओर रवाना हुआ और उसका कुछ अता-पता आज तक नहीं चल सका। उनकी इस हवाई-यात्रा का रहस्य अभी भी रहस्य ही बना हुआ है। यह राष्ट्र उस क्रान्तिवीर की प्रतीक्षा में अभी भी श्रद्धावनत हो किसी अप्रत्याशित अनुकूल समाचार की अपेक्षा रखता है।
 
नेताजी का निधन हवाई-दुर्घटना में हुआ अथवा वे इस घटनाक्रम के बाद भी जीवित रहे, इस रहस्य से पूरी तरह पर्दा नहीं उठ पाया है। कभी-कभी चमत्कारिक रूप से कोई घटना प्रचारित होती रहती है कि ‘नेताजी’ को कई लोगों ने देखा है। मगर यह सब सिर्फ हवा में ही उछलता रहा। आधिकारिक रूप से कई कमिशन भी बैठाये गए मगर कुछ ठोस नतीजा नहीं निकल पाया। अभी भी उनका निधन एक पहेली ही बना हुआ है।
 
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के विमान की लापता होने की खबर जो अगस्त 1945 में आई थी उसके करीब 70 वर्ष बाद 18 सितम्बर 2015 को पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा पुलिस म्युजियम कलकत्ता से नेताजी-सम्बन्धित 64 गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक किया गया है। इन फाइलों में नेताजी से सम्बन्धित अनेक घटनाक्रमों का विवरण है और इसमें कई चैंकाने वाले रहस्यमय तथ्य उजागर हुए हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि नेताजी और उनके परिवार की जासूसी भी कराई गई थी। इंटेजीलेंस ब्यूरो के 14 अधिकारियों द्वारा नेताजी के परिवार की जासूसी देश की आजादी के बाद सन् 1948 से सन् 1968 तक करवाई गई थी। 

अभी तो यह भी कहा जा रहा कि केन्द्र सरकार के पास भी 130 फाइलें हैं जिन्हें सार्वजनिक करने के लिए आवाजें उठने लगी हैं। अभी भी यह यक्ष-प्रश्न देश के सामने खड़ा है कि आखिर किस कारण से और किन लोगों द्वारा नेताजी से सम्बन्धित तथ्यों को अभी तक रोककर रखा गया था। मगर अभी भी रहस्य से पूरा परदा नहीं उठ पाया है। शायद कुछ और तथ्य भविष्य में उजागर हो सकेंगे। सारा देश अभी भी पूरे सच को जानने के लिए बेसब्री से इन्तजार कर रहा है। नेताजी के परिवार के लोग अभी भी सरकारी घोषणाओं से सन्तुष्ट नहीं हैं। नेताजी भारत के करोड़ों लोगों के हृदय में बसे हुए हैं और ये सभी लोग चाहते हैं कि नेताजी के बारे में रहस्य से परदा उठे और सारे सत्य उजागर हों।
 
इस सम्बन्ध में सत्यता चाहे जो भी हो मगर यह एक निर्विवाद सत्य है कि नेताजी आज भी करोड़ों देशवासियों केे हृदय में जीवित हैं। आज भी नेताजी का वह जीवन्त सम्बोधन ‘जय हिन्द’ हर भारतवासी के हृदय को छू जाता है। इस सम्बोधन में राष्ट्रीयता का तेजपुंज है, भारतीयता का ओज-शौर्य है और भारतमाता के विजय का उदात्त उद्घोष है। देश की आजादी के इतिहास में नेताजी का नाम स्वर्णिम अक्षरों में तो अंकित है ही, करोड़ों देशवासियों के हृदय में भी उनका सिंहनाद मुखरित है। हम जरा नेताजी के कुछ वाक्यांशों का स्मरण करें जिसमें इस देश की दशा की ओर इंगित करते हुए उन्होंने कहा था-
 
‘‘हमारे देश का सर्वस्व नष्ट हो चुका है तथापि निराश होने से काम चलेगा नहीं। हिन्दुस्तान के शस्य श्यामल खेत, यह ऋतम्भरा विश्वम्भरा धरती श्मशानचारी भूत-बैतालों की लीला-स्थली बन गई है। लेकिन हमें यह निष्क्रियता, नैराष्य, दुःख-दारिद्रय, निस्तब्धता सबको शक्तिमान् पुरुषार्थ पराक्रम में बदल देना है और हमें फिर से भारत का प्राचीन वैदिक राष्ट्रगीत गाना है- उत्तिष्ठत! जाग्रत!’’
 
एक स्वाधीन, स्वावलम्बी, सशक्त और स्वाभिमानी राष्ट्र के लिए नेताजी ने जो मानदंड बतलाया था, उनके स्थान पर नैतिक मूल्यों में ह्रास, अनुशासन का सर्वाधिक अभाव और राजनीति का छल-छद्म देखकर हमारी अन्तरात्मा रो उठती है। शायद नेताजी की आत्मा और अन्य शहीदों की आत्मा भी देश की इस दुरवस्था पर आँसू बहा रही होगी।
 
नेताजी राष्ट्रीय जीवन में अनुशासन के प्रबल पक्षधर थे। उनकी इच्छा थी कि भारत में विद्यार्थी जीवन से ही बच्चों और बच्चियों को अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाय जिससे बड़े होने पर सभी अपने जीवन को अनुशासित रख सकें। नेताजी जब जापान में थे उस समय की एक रोचक घटना है। टोकियो के एक होटल में ऊपरी मंजिल पर बैठे हुए अचानक सुभाष बाबू ने देखा सामने के रोड पर कतारबद्ध होकर अनुशासित ढंग से बहुत से बच्चे कदम-से-कदम मिलाकर जा रहे थे। उन्होंने होटल के मैनेजर को बुलाकर पूछा कि ये बच्चे कहाँ जा रहे हैं? मैनेजर ने तब हँसते हुए कहा- ‘‘सर! ये लोग आपका ही भाषण सुनने जा रहे हैं।’’ यह सुनकर सुभाष बाबू स्तब्ध रह गए। उन्होंने मन-ही-मन कहा- ‘‘ऐसा अद्भुत अनुशासन अगर भारत के बच्चों में भर दिया जाए तो भारत का भविष्य कितना सुन्दर हो जायेगा।’’
 
इस दृश्य को देखकर सुभाष बाबू ने अपने भावों को व्यक्त करते हुए कहा था- ‘‘मेरी बड़ी अभिलाषा है कि जब हमारा देश स्वतंत्र हो तो शुरू के बीस वर्षों में सब बच्चों को सैनिक जीवन के अनुशासन, भाईचारा, पे्रमनिष्ठा और राष्ट्रपे्रम की शिक्षा दी जाय। तब जीवन की पद्धति किसी को सिखलानी नहीं पड़ेगी और हमारे देशवासियों की तरफ कोई उँगली नहीं उठा सकेगा।’’
 
नेताजी के ये विचार आज और भी प्रासंगिक हो गए हैं। आज देश को यह जान लेने की जरूरत है कि देश का भविष्य तथाकथित राजनेताओं की तिकड़मी चाल में नहीं है और न सिद्धान्तविहीन राजनीति में है बल्कि भारत के अमर शहीदों के त्याग, बलिदान और आदर्श को अपनाने में ही राष्ट्र का वर्तमान और भविष्य दोनों सुरक्षित है।
नेताजी केे ‘सन्देश’ आज भी वह्नि-स्फुलिंग की तरह हमारे मस्तिष्क में कौंध उठते हैं। देश की आजादी के लिए विदेश की धरती से कुछ क्रान्तिकारी सन्देश जो उन्होंने दिया उसकी एक झलकमात्र हमें झकझोरकर कुछ सोचने के लिए बाध्य करती है।
 
‘आजाद हिन्द फौज’ के गठित होने पर उन्होंने कहा था- ‘‘साथियो! मेरे सिपाहियो! आपका नारा हो- ‘‘दिल्ली चलो, दिल्ली चलो’’। मैं नहीं जानता स्वाधीनता के इस युद्ध में कितने व्यक्ति जीवित बचेंगे, लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि अन्त में जीत हमारी ही होगी। हमारा कार्य तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक बाकी बचे हुए बहादुर सिपाही पुरानी दिल्ली के लाल किले के सामने साम्राज्य की दूसरी कब्र पर परेड न कर लेंगे।’’ क्या ऐसी क्रान्तिकारी आवाज आपने कभी सुनी है?
 
इसी क्रम में उन्होंने अपने भाषण में एक बार फिर कहा था- ‘‘हममें से कौन भारत को स्वतंत्र देखने के लिए जीवित रहेगा? हमारे लिए इतना ही बहुत है कि भारत स्वतंत्र हो और हम अपना सर्वस्व स्वतंत्रता के लिए दे दें। भगवान् हमारी सेना को आाशीर्वाद दें और भावी युद्ध में हमें विजय दें।’’ उन्होंने अंत में कहा- ‘‘इन्कलाब जिन्दाबाद! आजाद हिन्द जिन्दाबाद!’’ हमें नेताजी के आशीर्वाद से आजादी तो मिल गई लेकिन क्या हम उनकी उदात्त राष्ट्र-भावना का आज सम्मान कर रहे हैं?
 
आजाद हिन्द रेडियो जर्मनी से बोलते हुए उन्होंने सन् 1942 में कहा था- ‘‘सुबह से पहले अँधेरी घड़ी अवश्य आती है। बहादुर बनो और संघर्ष जारी रखो क्योंकि स्वतंत्रता निकट है।’’ आज उस स्वप्नद्रष्टा के उद्घोष के अनुसार स्वतंत्रता सन् 1947 में ही आ भी गई मगर क्या हम उस स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कुछ त्याग और बलिदान के साथ राष्ट्रीय अस्मिता को गौरवशाली बनाने में अपना थोड़ा भी योगदान दे पा रहे हैं?
 
सिंगापुर से प्रसारण में 1945 में उन्होंने एक तरह से अपना अन्तिम संदेश देते हुए कहा था- ‘‘मेरा अन्तिम सन्देश है, स्वतंत्रता की अग्नि सदैव जलाये रखना। मार्ग में आये कष्टों से घबड़ाना नहीं। जय हिन्द।’’
क्या स्वतंत्रता की वह आग अभी भी हमारे हृदय में धधक रही है? हमारा राष्ट्रीय चरित्र क्या उस महान् क्रान्तिकारी को याद कर देश के लिए कुछ न्योछावर करने को प्रेरित कर रहा है?
 
अन्त में एक जगह सिंगापुर में सैनिकों को ललकारते हुए नेताजी ने कहा था- ‘‘आज मैं आपसे एक सर्वोच्च बलिदान चाहता हूँ। मैं तुमसे रक्त चाहता हूँ। रक्त ही हमारे उस रक्त का बदला लेगा जिसे हमारे शत्रुओं ने बहाया है। रक्त ही स्वतंत्रता का मूल्य चुका सकता है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’’
आज हमारी नई पीढ़ी को नेताजी के इन क्रान्तिकारी संदेशों से प्रेरणा लेकर राष्ट्र के नव-निर्माण में अपनी सारी शक्ति लगा देनी चाहिए। यही उस महान् क्रान्तदर्शी नेता के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
 
 
Ref. Article source from Apani Maati Apana Chandan, Author-Sukhnandan singh saday, picture source from zeenews.india.com, keywords Subhashchandra Bose, veer subhashchandra bose.

वीर सावरकर | Veer Savarkar

स्वातंत्रय वीर - सावरकर

अपूर्व साहस, अद्भुत वीरता और प्रखर देशभक्ति से समन्वित व्यक्तित्व का नाम है-स्वातंत्रय वीर सावरकर। यह महान् स्वतन्त्रता-सेनानी भारतीय संस्कृति और सुधारवादी हिन्दू-धर्म का शंखनाद करने वाला असाधारण व्यक्तित्व का धनी था, जिसके जीवन का एक-एक क्षण भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। स्वाधीनता-संग्राम के इस जन्मजात योद्धा का जन्म 20 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर नामक ग्राम में पिता श्री दामोदर सावरकर और माता राधाबाई के यहाँ हुआ था। बचपन का नाम विनायक था मगर जीवन में इन्हें ‘सावरकर’ नाम से ही सभी जानते हैं। बचपन से ही आग उगलने वाले ‘पोवाडे़’ लिखने की अद्भुत क्षमता ने ‘सावरकर’ को जन-जन का प्रिय बना दिया था। सन् 1897 में चापेकर बन्धुओं ख्तीनों भाइयों, द्वारा पूना के अंग्रेज प्लेग कमिश्नर की हत्या के बाद उन्हें फाँसी की सजा सुनाये जाने पर बालक विनायक का हृदय विदीर्ण हो उठा और उसने अपनी कुलदेवी दुर्गा के समक्ष प्रतिज्ञा ली-‘‘देश की स्वाधीनता के लिए जीवन के अन्तिम क्षणों तक सशस्त्र क्रान्ति का झंडा लेकर जूझता रहूँगा।’’ सावरकर ने जीवन में यह प्रतिज्ञा सचमुच पूरी करके दिखला दी। 
सुप्रसिद्ध राष्ट्रकवि पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा इंग्लैंड में इंडिया हाउस का संचालन करते थे और राष्ट्रभक्त छात्रों के लिए महर्षि दयानन्द, शिवाजी और महाराणा प्रताप के नाम पर छात्रवृत्तियाँ भी देते थे। इसी संदर्भ में शिवाजी छात्रवृत्ति के अन्तर्गत श्री बाल गंगाधर तिलक की संस्तुति पर ‘सावरकर’ को यह छात्रवृत्ति प्रदान की गई और सन् 1906 में आप इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। उत्तरी लन्दन में स्थित ‘इंडिया हाउस’ में आपके ठहरने की व्यवस्था की गई और जीवन के करीब चार वर्ष इन्होंने जो लन्दन में गुजारे वह भारत की स्वतन्त्रता के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जा सकते हैं। लन्दन में ही सावरकर जी ने ‘फ्री इंडिया सोसायटी’ की स्थापना की और इसके माध्यम से भारतीय नवयुवकों को देश की स्वतन्त्रता के निमित्त त्याग और बलिदान के लिए प्रेरित करते रहे। सावरकर जी इटली के स्वतन्त्रता सेनानी ‘जोजेफ मैजिनी और गैरीबाल्डी’ के विचारों से बहुत प्रभावित थे और देश के लिए उनके आदर्शों के प्रशंसक थे। इसलिए इंग्लैंड में लिखी उनकी पहली पुस्तक ‘मैजिनी की आत्मकथा’ का ही मराठी रूपान्तर था जिसने देशवासियों में तहलका मचा दिया था। इसी  पुस्तक के कुछ अंश इस प्रकार थे - ‘‘कोई भी राष्ट्र कदापि नहीं मरता। परमात्मा ने मानव को स्वतन्त्र रहने के लिए उत्पन्न किया है। जब दृढ़ संकल्प लोगे तभी तुम्हारा देश भी स्वतन्त्र हो जायेगा।’’

        सावरकर जी इंडिया हाउस में रह कर इंग्लैंड और भारत में रह रहे क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन किया करते थे और यह सब कुछ करते हुए भी उनके प्रकांड पांडित्य में भी कहीं व्यवधान नहीं आता था। तभी एक धमाका हुआ और सन् 1907 में भारतीय स्वतन्त्रता की स्वर्ण जयन्ती मनाने का निर्णय इंडिया हाउस में किया गया। लन्दन में यह दिन  भारतीय क्रांतिकारियों पर इंग्लैंड की महान् विजय के रूप में मनाया जाता था। 6 मई 1907 को तो लन्दन में प्रमुख दैनिक ‘डेली टेलीग्राफ’ ने अपने अग्रपृष्ठ पर यह वाक्य छापा - ‘‘ पचास वर्ष पूर्व इसी सप्ताह हमने वीरतापूर्वक अपने साम्राज्य की रक्षा की।’’ इस तरह जहाँ एक ओर इंग्लैंड में इस वर्ष को विजय-पर्व के रूप में मनाने का प्रयास हो रहा था, वहीं सावरकर जी अपने साथियों के साथ भारतीय स्वतन्त्रता के अमर सेनानियों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए कृतसंकल्प थे। 10 मई 1907 को इंडिया हाउस को खूब सजाया गया और मंच पर हुतात्माओं के चित्र रखे गये। समारोह का प्रारम्भ राष्ट्र-गान से हुआ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे के साथ वक्ताओं के ओजस्वी भाषण हुए। सावरकर जी ने अपनी आग्नेय वाणी में नवयुवकों को उन क्रांतिकारियों के पथ पर आगे बढ़ने का आह्वान किया जिन्होंने राष्ट्र की वेदी पर अपने को हँसते-हँसते समर्पित कर दिया था। ‘भारतीय स्वातन्त्रय समर का इतिहास’ लिख कर सावरकर ने जो ख्याति अर्जित की वह बेमिसाल है। इस तरह  अंग्रेजों के घर में वे अंग्रेजों को ही मात दे रहे थे। इसी बीच श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा ‘पेरिस’ चले गये और इंडिया हाउस सम्भालने का पूरा भार ‘सावरकर’ पर ही आ पड़ा। सावरकर जी ने अपने लेखों के माध्यम से विश्व भर के देश-भक्तों को भारत की मुक्ति के लिए प्रयास करने का आह्वान किया। इंडिया हाउस का हर सदस्य शुभ रात्रि के समय कहा करता था - 

‘‘एक देव, एक देश, एक भाषा, 
एक जाति, एक जीव, एक आशा।’’

इसी समय 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टुटगार्ट नगर में ’अन्तर्राष्ट्रीय समाज संघ’ की बैठक आयोजित हुई जिसने सावरकर जी के परामर्श से ‘मादाम कामा’ एवं ‘सरदार सिंह राणा’ को वहाँ भेजा गया। ‘मादाम कामा’ ने वहाँ जाकर भारतीय ध्वज हाथों में उठाते हुए गरज कर कहा - ‘‘यह भारतीय स्वतन्त्रता का ध्वज है। शहीदांे के रक्त से सिंचित हो यह और भी पावन हो गया है। मैं आप सभी स्वतन्त्रता-प्रेमियों को आह्वान करती हूँ कि आप सब उठ कर इस भारतीय ध्वज को सम्मान दें।’’ 

और सचमुच उनकी आवाज में एक सम्मोहन था जिसके चलते सभी प्रतिनिधि उठकर खड़े हो गये। सभा-भवन देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूँजता रहा और विश्व स्तर पर भारत की स्वतन्त्रता की चर्चा होने लगी।

सावरकर सचमुच ऐसी धातु से बने हुए थे जो तपाने पर और भी निखरने लगता है, प्रतिकूल परिस्थितियों में और भी अधिक उत्साह से जूझने के लिए तत्पर होता है। इसलिए उन्होंने देशद्रोहियों की ओर संकेत करते हुए एक जगह कहा - ‘‘ देशद्रोहियों की अग्रिम पंक्ति में खड़े होने से कहीं अच्छा है कि देशभक्तों की अन्तिम पंक्ति में खड़ा हुआ जाए।’’ भारत के ही कई गद्दारों ने स्वतन्त्रता-संग्राम के सेनानियों के प्रयास को जितनी बाधा पहुँचाई उतना नुकसान शायद विदेेशी शत्रुओं ने भी नहीं किया । 

वीर सावरकर  ने 1857 को ‘स्वातन्त्रय समर’ नामक ऐतिहासिक ग्रंथ की रचना मराठी भाषा में जब 1907 में पूरी की तो स्काॅटलैंड यार्ड की गुप्त शाखा को इसकी भनक लग गई। भारत में जगह-जगह छापे मारे गये मगर मूल पांडुलिपि भारत से पेरिस भेज दी गई। फिर इस ग्रंथ का अंग्रेजी अनुवाद श्री वी0 वी0एस0 अय्यर एवं बैरिस्टर फड़के द्वारा किया गया और अथक प्रयास के बाद हालैंड में इस पुस्तक का प्रथम अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हो पाया। तदुपरान्त 1909 में इस पुस्तक का प्रकाशन फ्रांस से हुआ। सारे विश्व में स्वतन्त्रता-प्रेमियों ने इस पुस्तक की सराहना की और भारत के क्रांतिकारियों के लिए तो यह भगवद्गीता की तरह पवित्र धरोहर बन गई। इसी पुस्तक का तृतीय संस्करण अमर शहीद सरदार भगत सिंह ने 1929 में गुप्त रूप से कराया। विदित हो कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के मलाया पहुँचने पर उनके हाथ में भी इस पुस्तक की एक पांडुलिपि दी गई। मगर इस ग्रंथ का मूल मराठी संस्करण 1936 में वीर सावरकर के साहित्य से प्रतिबन्ध उठा लेने के बाद ही प्रकाशित हो सका। 

सावरकर सदा से सशक्त क्रांति के पक्षधर थे और इसे वे शीघ्र ही क्रियान्वित करने के लिए उतावले भी हो रहे थे। वे लन्दन से भारत के क्रांतिकारियों के लिए आग्नेय अस्त्रों के साथ-साथ बम बनाने के मैनुअल भी भेजा करते थे। इसी क्रम में इंडिया हाउस के रसोइये चतुर्भुज के माध्यम से उन्होंने संदूक की चोर तली में छिपा कर स्वचालित ब्राउनिंग, पिस्तौलें ‘अभिनव भारत संस्थान’ के तत्कालीन अध्यक्ष के पास भेजी। उनसे सम्पर्क नहीं होने के कारण चतुर्भुज ने यह पार्सल उनके एक अन्य मित्र को दे दिया और वहीं से गलत वितरण के कारण यह बात गुप्त नहीं रह सकी। अंग्रेजों के कान खड़े हो गये और कई लोगों को इस सम्बन्ध में गिरफ्तार कर लिया गया। इसी घटना क्रम में सावरकर को समाचार मिला कि उनकी एक मात्र सन्तान 8 वर्षीय पुत्र प्रभाकर चेचक से मर गया और उनके बड़े भाई बाबा राव सावरकर को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। सावरकर फिर भी विचलित नहीं हुए। 

यह कितनी बड़ी विडम्बना थी कि इंग्लैंड की राजरानी की प्रशंसा में गीत लिखने वालों को पुरस्कृत किया जा रहा था। वहीं देश-भक्ति की रचना करने वालों को दंडित किया जा रहा था। मगर यह हमेशा से होता आया है और सम्भवतः आगे भी होता रहेगा। सच्चे देशभक्त इस गणित के लेखा-जोखा का हिसाब नहीं करते और अपनी कुर्बानी से इतिहास रच जाते हैं। सावरकर ने जब ये हृदय-विदारक समाचार सुना तो उनके हृदय में अंग्रेजों के प्रति क्रोध नहीं बल्कि प्रतिशोध की अग्नि जलने लगी। फिर भी वह नर-पुंगव जरा भी विचलित नहीं हुआ। 

इसी समय एक और घटना घट गई। 1 जुलाई 1909 को लन्दन के इम्पीरियल-इंस्टिच्यूट के जहाँगीर हाॅल में मदनलाल ढींगरा ने कर्जन वायली नामक एक अंग्रेज अधिकारी की गोली मार कर हत्या कर दी। ब्रिटिश अधिकारियों को यह निश्चिय हो गया कि मदनलाल ढींगरा ने सावरकर की प्रेरणा से ही कर्जन वायली की हत्या की है। 17 अगस्त 1909 को मदनलाल ढींगरा को फाँसी पर लटका दिया गया। उसके अन्तिम शब्द थे-‘‘ईश्वर से मेरी अन्तिम प्रार्थना है कि मैं तब तक उसी भारत के लिए जन्मता और पुनः मरता रहूँ जब तक यह स्वतन्त्र न हो जाये।’’

इधर सावरकर के बड़े भाई की गिरफ्तारी के बाद छोटे भाई श्री नारायण दामोदर सावरकर को गिरफ्तार कर लिया गया। सावरकर ने इस समाचार को सुन कर गर्व से कहा-’’इससे ज्यादा गौरव की बात और क्या होगी कि हम तीनों भाई ही स्वातन्त्रय लक्ष्मी की आराधना में लीन हैं।’’ और इस घटना-चक्र की पूर्णाहुति 13 मार्च 1910 को लन्दन के विक्टोरिया स्टेशन पर सावरकर की गिरफ्तारी से हुई। सावरकर  को लन्दन के ब्रिस्टल जेल में बन्द कर दिया गया। उन्होंने वहीं से अपनी पूज्या भावज को मराठी काव्य में अपना ‘मृत्यु-पत्र’ लिख कर भेजा। इस ‘‘मृत्यु-पत्र’ में सावरकर ने अपनी भाव-प्रवण भाषा में लिखा-‘‘ .......अपनी माँ को बन्धन-मुक्त करने के लिए प्रज्वलित अग्निकुंड में अपना सर्वस्व जलाकर हम आज कृतार्थ हो गये हैं। ..........वंश चाहे अखंड हो या न हो, पर मातृभूमि ! हमारे उद्देश्य पूरित हों ! प्रज्वलित अग्नि में माता के बन्धन को तोड़ने के लिए अपना सर्वस्व जलाकर हम कृतार्थ हो गये हैं।’’

इस नर-पुंगव को भारत में मुकदमा चलाने के लिए 1 जुलाई 1910 को इंग्लैंड से मोरिया जलयान द्वारा भारत लाया जा रहा था-तभी एक आश्चर्यजनक धमाका हुआ और फ्रांस के मार्सेल्स बन्दरगाह के निकट जहाज पहुँचते ही सावरकर ने समुद्र में छलांग लगा दी। गोरे अधिकारियों की गोलियों की बौछार के बीच वे फ्रांस के सागरतट पर पहुँच ही गये, मगर फ्रांस के सिपाहियों ने उन्हें अंग्रेजों को फिर सौंप दिया। इस सम्बन्ध में कहा जाता है कि योजना के अनुसार श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा, मैडम कामा आदि के मार्सेल्स बन्दरगाह पर पहुचँने में देरी हो गई जिस कारण सावरकर को छुड़ाने का प्रयास पूरा न हो सका। 

सावरकर को ‘यरवदा’ कारा में बन्द कर दिया गया और ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध षड्यंत्र के आरोप में नाटक प्रारम्भ हुआ। इस नाटक का पटाक्षेप सावरकर को दो आजीवन कारावास के दंड के साथ हुआ। अपने दो जन्मों के कारावास ख्50 वर्षों का आजीवन कारावास, पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सावरकर ने हँसते हुए कहा-’’मुझे बहुत प्रसन्नता है कि ईसाई ख्ब्रिटिश, सरकार ने मुझे दो जीवनों के कारावास का दण्ड देकर हिन्दू-धर्म के पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मान लिया है।’’

सावरकर को दो आजन्म कारावास  का दंड देकर उन्हें अंडमान भेजने के पूर्व कुछ  दिन डोगरी जेल में रखा गया-जहाँ कभी बाल गंगाधर तिलक को भी रखा गया था। इसी वर्ष उनकी पत्नी 19 वर्षीया श्रीमती माई सावरकर डोंगरी जेल में उनसे मिलने आयीं। सावरकर ने अपनी तरुण पत्नी को धीरज बँधाते हुए कहा-‘‘माना कि अपना सुखी जीवन हमने अपने हाथों ध्वस्त कर दिया किन्तु भविष्य में सहस्रों घर में सुख की वर्षा होगी। क्या तब हमें अपना बलिदान सार्थक न लगेगा।’’ वीर पत्नी ने भी दृढ़तापूर्वक कहा-‘‘आप चिन्ता न करें ! मुझे क्या कम सुख है कि मेरा वीर पति मातृभूमि की सेवा के लिए कठोर साधना कर रहा है।’’ 

पति-पत्नी की इस रोमांचकारी भेंट-वार्ता सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं और राष्ट्र के साथ खिलवाड़ करने वाले उन तथाकथित नेताओं के चेहरे पर कालिख पोतने की इच्छा होती है। आखिर सावरकर को अण्डमान जेल की कोठरी संख्या-123 में  लाया गया और सख्ती के साथ उन पर क्रूर अत्याचार किये गये। इस अण्डमान जेल में सावरकर की काव्य-प्रतिभा और निखर उठी। उन्होंने करीब दस हजार काव्य पंक्तियों की यहाँ रचना की। अण्डमान की काल-कोठरी में उन्होंने उद्घोष किया-‘‘मैं अनादि हूँ, अनन्त हूँ, आज विश्व में कौन ऐसा शत्रु है जो मुझे मार सके।’’ 

अण्डमान की जेल में हिन्दी के प्रचार के लिए सावरकर जी सतत प्रयत्नशील रहे। उन्होंने जन-जन को हिन्दी का महत्त्व समझाया और इसके लिए कारागार में ही उन्होंने ग्रन्थालय-वाचनालय की स्थापना करवायी। हिन्दी सीखने के लिए उन्होंने कैदियों को भी प्रेरित किया। 

यह एक बिडम्बना ही रही कि इसी अण्डमान जेल में उनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर भी लाये गये थे। अचानक ही एक दिन दोनों भाइयों के मिलन ने राम और भरत की तरह एक पावन दृश्य उपस्थित कर दिया।

एक दिन सबसे छोटे भाई जब अण्डमान में मिलने के लिए गये तो सावरकर ने उनसे कहा-‘‘बाल ! मैं यह जानता हूँ कि तुम बहुत साहसी और धैर्यवान् हो । हम दोनों भाइयों के परिवार का दायित्व तुम्हीं वर्षों सेे निभा रहे हो और आगे भी निभाते रहोगे। शायद यह हमलोगों की अन्तिम भेंट होगी।’’ 

इस हृदय-विदारक वार्ता से दोनों भाइयों की आँखों में आँसू छलछला आये मगर वीरत्व की चिनगारी ने उन्हें महिमा-मंडित कर दिया। दिन बीतते गये। बलिदान की स्याही से आजादी का इतिहास लिखता जा रहा था। तभी एक खबर आयी कि ‘सावरकर बन्धुओं‘ को हिन्दुस्तान वापस भेजा जा रहा है। अण्डमान में दस वर्षों तक रहने के बाद सावरकर की हिन्दुस्तान वापसी हो रही थी। अनेक लोग उन्हें बधाई देने आये मगर सावरकर निर्विकार थे। दोनों भाइयों को महाराजा जलयान से भारत लाया गया। मातृभूमि पर पैर पड़ते ही दोनों भाई हाथ जोड़ कर बोल पड़े-‘‘स्वातन्त्रय लक्ष्मी की जय-वन्दे मातरम्!’’ इतिहास के एक अध्याय का पटाक्षेप हुआ। मगर अभी आगे का अध्याय प्रारम्भ होने वाला था। 

भारत आने पर सावरकर जी को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जेल में नजरबन्द कर दिया गया। वे रत्नागिरी में नजरबन्द रहकर भी राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत अनेक पुस्तकों एवं सैकड़ों लेखों को लिखते रहे। यहीं पर उन्होंने शुद्धि का बिगुल बजाया और हजारों बिछुड़े भाइयों को अपने स्वधर्म में आने के लिए प्रेरित किया। अनेक प्रतिबन्धों के बावजूद सन् 1929 में जब सावरकर जी नासिक गये तो डाॅ0 मुंजे, जगद्गुरु शंकराचार्य एवं चिन्तामणि केलकर की उपस्थिति में उनका नागरिक अभिनन्दन किया गया। केलकर जी ने इस अवसर पर कहा-‘‘आपकी उत्कट देशभक्ति एवं देश के लिए उठाये गये आपके कठिन कष्टों के लिए महाराष्ट्रीय जनता के हृदय में आपके प्रति अत्यन्त आदर है।’’

वीर सावरकर ने अभिनन्दन का उत्तर देते हुए कहा-’’...........आज जैसा मेरा सम्मान किया जा रहा है, यह बात मेरे मन में कभी आयी ही नहीं । नवयुवकगण मेरा सम्मान देखकर यह न समझें कि समाज-सेवा या राष्ट्र-सेवा सम्मान-प्राप्ति के लिए करनी चाहिए।’’ उन्होंने स्पार्टा के उस वीर पुरुष की वाणी को दुहराया, जिसने कहा था- ‘‘स्पार्टा के पास उससे बढ़कर वीर विद्यमान है और आने वाली सन्तान और भी श्रेष्ठ पैदा होगी।’’ सावरकर जी ने कहा कि मैं भी यही कहता हूँ कि मुझसे हजार गुणा तेजस्वी वीर आज भी देश में हैं और आगे भी पैदा होंगे। यह कथन उनकी विनम्रता का प्रतीक था। 

सन् 1927 में महात्मा गाँधी भी सावरकर जी से रत्नागिरी जाकर मिले थे। गाँधीजी ने उनकी देश-भक्ति की मुक्त-कंठों से प्रशंसा की थी। मगर दोनों के विचारों में जीवन-पर्यन्त अन्तर बना रहा। सावरकर जी प्रखर राष्ट्रवाद के समर्थक थे और गाँधीजी मानवतावाद के। अपने-अपने विचारों पर दोनों आजीवन दृढ़ रहे और समय-समय पर अनेक विषयों पर दोनों महापुरुषों की मत-भिन्नता भी प्रकट होती रही। अन्त में श्री जमुनादास मेहता के प्रयास से 10 मई 1937 को रत्नागिरी की नजरबन्दी से वीर सावरकर को मुक्ति मिली। 

सावरकर जी की नजरबन्दी से मुक्त होने पर सुभाषचन्द्र बोस ने भी तार देकर कांगे्रस का नेतृत्व सम्भालने के लिए उनसे आग्रह किया। मगर सावरकर जी ने अपने सिद्धान्तों के अनुरूप ‘हिन्दू महासभा’ को ही वरण किया। 30 दिसम्बर 1937 को अहमदाबाद अधिवेशन में वे ‘हिन्दू महासभा’ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 22 जून 1940 को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस अचानक सावरकर सदन आये और सावरकर जी से भेंट की। देश की आजादी के सम्बन्ध में दोनों महान् नेताओं में विशद चर्चा हुई। सावरकर जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सशक्त क्रान्ति का प्रयास किये बिना अब भारत को स्वतन्त्र नहीं कराया जा सकता। सम्भवतः इन्हीं विचारों से प्रभावित हो नेताजी जर्मनी होते हुए सिंगापुर पहुँच गये और वहीं पर ‘आजाद हिन्द सेना’ की स्थापना की। 

       प्रख्यात अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर, एक बार भारत आने पर जिन्ना से मिलने के बाद सावरकर जी से भी मिले। उन्होंने पूछा कि आपको पाकिस्तान बनने में क्या आपत्ति है? इस पर सावरकर जी ने कहा-‘‘आपको नीग्रोस्तान क्यों नहीं स्वीकार है? हठात् फिशर के मुँह से निकल गया- देश का विभाजन अपराध होगा। तभी सावरकर जी ने कहा-’’हर राष्ट्रभक्त अपने देश के टुकड़े होना सहन नहीं कर सकता । इसलिए हम भी भारत-विभाजन के पक्षधर नहीं हैं। सावरकर जी का उत्तर सुनकर लुई फिशर चुप हो गये। मगर अनेक भारतीय नेता ही इस विभाजन के पक्षधर बन गये-यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा और इस महान् नेता की चेतावनी के बावजूद 3 जून 1947 को देश-विभाजन की घोषणा कर  दी गई। यह देश बलिदानियों की त्याग-तपस्या से आजाद तो हो गया मगर खंडित होकर। सावरकर जी जैसे प्रखर राष्ट्रभक्त इस विभाजित भारत की आजादी से प्रसन्न नहीं थे। भारत को अखंड कराने की तीव्र लालसा वे जीवन-पर्यन्त अपने कलेजे में सँजोये रहे। यह भी कितनी बड़ी बिडम्बना है कि 1910 से 1937 तक कारा में बन्द रहने वाला यह क्रान्तिवीर देश की आजादी के बाद भी कई बार बन्दी बनाया गया। हमारी कृतघ्नता अपने चरम सीमा को ही छू रही थी जब हमने उस महान् राष्ट्रनायक को स्वतन्त्र-भारत में भी कई बार बन्दी बनाया। देश की दुर्दशा देखकर सावरकर जी फूट-फूट कर रोने लगते थे। उनके हृदय से कविता की धारा फूट पड़ती थी - 

‘‘ऐ सिन्धु ! तुझे मुक्त करेगी महाराष्ट्र की रक्त-बिन्दु।’’ 

सावरकर जी का स्वास्थ्य भी धीरे-धीरे गिरता गया और अंडमान की काल कोठरी में उनके जिस्म में घुसे विषाणु उनके शरीर को भीतर से खोखला करते रहे। रही-सही कसर हमारी कृतघ्नता ने पूरी कर दी। 

सन् 1962 में भारत पर चीन द्वारा किए गये आक्रमण एवं विश्वासघात से यह नर-केसरी सचमुच आहत हो उठा। इस वयोवृद्ध क्रान्तिवीर के रुँधे गले से ये शब्द निकल पड़े- ‘‘काश ! अगर देश हमारी नीति पर चलता तो हमारी ऐसी दुःस्थिति नहीं होती।’’ और 1965 में पाकिस्तान की लड़ाई में भारत की विजय से यह क्रान्ति-पुरुष थोड़ा आश्वस्त हुआ ही था कि ताशकन्द समझौते ने इनकी आशाओं पर पानी फेर दिया। वे एक बार फिर मर्माहत हो उठे। वे बड़बड़ाने लगे-‘‘क्या करना है अब जी कर मुझे?’’ और सचमुच वह स्वातन्त्रय वीर 26 फरवरी 1966 को भारत-माता के चरणों में विलीन हो गया। वह वज्र-पुरुष चिता को समर्पित हो गया। 

        एक गौरवपूर्ण इतिहास-पुरुष का अन्त हो गया। राष्ट्र-भक्त शोकमग्न हो गये। स्वतन्त्रता-संग्राम के एक उज्ज्वल नक्षत्र का लोप हो गया। शायद आज सावरकर जी  रहते तो इन तथाकथित नेताओं के कुकृत्यों को देखकर और अधिक मर्माहत हो उठते। हवाला-वृत्ति से लेकर भ्रष्टाचार की विकृति की छाप ओढ़े नेता आज जिस भारतमाता की स्वतन्त्रता के गीत गाकर सत्ता-सुख का भोग कर रहे हैं, उन्हें क्या पता कि अपने यौवन की दहलीज पर कदम रखने वाला वह मराठी युवक बैरिस्टर बनकर अपनी पत्नी और बच्चों की परवरिश करने के बदले देश की आजादी की वकालत करता रहा और जीवन के स्वर्णिम 27 वर्ष काल-कोठरी और नजरबन्दी में गुजार दिया। भारतमाता के भव्य मन्दिर के निर्माण में नींव की ईंट बनकर वे ढाँचे का सारा बोझ अपने ऊपर उठाये रहे और न कभी किसी प्रंशसा की कामना की और न किसी प्रदर्शन की। सावरकर जी का कर्मनिष्ठ-जीवन तपोमय, त्यागमय और बलिदानी निष्ठा से ओतप्रोत था, जिसमें राष्ट्र की बलि-वेदी पर अपने आप को निःस्वार्थ भाव से न्योछावर करने की अदम्य अभिलाषा थी। 

सावरकर जी एक व्यक्ति नहीं बल्कि राष्ट्रवादी विचारधारा की अनुकृति थे। देशभक्ति, राष्ट्रपे्रम के पर्याय के रूप में सावरकर का नाम सार्थकता को सँजोये आज भी वर्तमान और भावी पीढ़ी को ललकार कर उसे देश के लिए मर-मिटने का आह्वान करती है। ‘तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे न रहे’ की वाणी को अपने जीवन के एक-एक क्षण में साकार करने वाले सावरकर जी  का नाम भी शायद आज की नयी पीढ़ी नहीं जानती। जो भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास की अनुपम धरोहर है उन्हें ही आज इतिहास के पृष्ठों से निकाल दिया गया है। मगर सावरकर जी जैसे महापुरुष काल की छाती पर भी अमरत्व का गीत लिख जाते हैं। 

इतिहास के पन्नों के वे मुहताज नहीं होते। लेकिन जब-जब देश अपने राष्ट्रीय गौरव के इतिहास को भुलाने की कोशिश करता है, उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। ईश्वर करे इन देशवासियों में यह सद्बुद्धि आये और हम अपनी संास्कृतिक और राष्ट्रीय इतिहास की विरासत को पहचान कर उसकी रक्षा के लिए सचेत रहें। हमारे माथे पर कृतघ्नता का पाप न लगे-इसके लिए हमें प्रायश्चित करना होगा और सावरकर जी जैसे राष्ट्रभक्त से क्षमा मांगनी होगी। शायद उनकी महान् आत्मा हमें क्षमा कर दे और हम सबमें राष्ट्रीयता की भावना भर दे।
Ref. Picture source from Achhikhabar.com. Article source from Apani Maati Apana chandan, Author- Sukhnandan singh saday.

महात्मा गाँधी | Mahatma Gandhi

साबरमती के संत - महात्मा गाँधी 

 
 
‘मेरा जीवन ही मेरा दर्शन है’ इस कथन के द्वारा महात्मा गाँधी ने सचमुच अपने जीवन-दर्शन के सत्य को उद्घाटित कर दिया था। गाँधीजी के सम्बन्ध में अब तक करीब चार हजार पुस्तकें छप चुकी हैं, जो विश्व की विविध भाषाओं में हैं। इसके अतिरिक्त अभी भी हर वर्ष विभिन्न भाषाओं में करीब पचास पुस्तकें निकलती हैं। गाँधीजी के बारे में जहाँ गाँधीवादियों ने भी जमकर लिखा, वहीं देश-विदेश के प्रशंसकों ने भी उन पर अपनी लेखनी चलाई। प्रख्यात गाँधीवादी चिन्तक डा0 पट्टाभिसीतारमैया, आचार्य जे0पी0 कृपलानी, डा0 पी0 सी0 घोष, महादेव देसाई, प्यारे लाल, डा0 राजेन्द्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू, डा0 शंकरदयाल सिंह, डा0 रामजी सिंह से लेकर, विदेशी लेखक रोमाँ रोलाँ और लुई फिशर तक ने गाँधीजी के बारे में जो कुछ लिखा था, वह निश्चय ही भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम के इतिहास की एक अनमोल धरोहर है। फ्रेंच साहित्य में रोमाँ रोलाँ (1866-1944) इतिहास विषय के ज्ञाता होते हुए भी कला, साहित्य और संस्कृति के अनन्य उपासक थे। 

सन् 1915 में उन्हें अपने आत्मकथात्मक उपन्यास- जाॅन क्रिस्तोफर‘ पर नोबल पुरस्कार दिया गया।  उन्होंने महात्मा गाँधी की जीवनी 1924 में और स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द की जीवनी 1928-29 में लिखी। इसी तरह लुई फिशर विश्वविख्यात पत्रकार थे, जिन्होंने ‘The life of Mahatma Gandhi‘ (महात्मा गाँधी की कहानी) लिखकर अपने लेखन को कृतार्थ कर दिया। जिस ‘गाँधी की कहानी’ को लुई फिशर ने लिखा- आखिर वह कहानी विश्ववंद्य बन गई-बापू की कहानी के रूप में, साबरमती के संत की कहानी के रूप में ।

गुजरात का वह भाग जिसे सौराष्ट्र कहते हैं, उसका जिला मुख्यालय राजकोट है। इसी राजकोट के अन्तर्गत पोरबन्दर वहाँ के सौन्दर्य में वृद्धि करता हुआ निरन्तर अट्टहास करता रहता है। इसी पोरबन्दर के एक छोटे रजवाड़े के यहाँ गाँधीजी के पिता श्री करमचन्द गाँधी दीवान थे। गाँधीजी के पितामह का नाम था उत्तमचन्द गाँधी। कुछ लोग कहते हैं कि शायद इनके पूर्वज ‘गंध’ के व्यापार से जुड़े रहने के कारण अपने नाम के साथ ‘गाँधी’ लिखते थे। मगर वास्तविकता चाहे जो भी हो, इतना तो स्पष्ट है कि गाँधीजी  के दादाजी और पिताजी व्यवसाय के कारोबार में नहीं थे। 

गाँधीजी के पूर्वजों का मकान अब ‘कीर्ति-मन्दिर‘ के नाम से दर्शनीय बन गया है। इसी पोरबन्दर नगर में गाँधीजी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पिता श्री करमचन्द गाँधी और माता पुतली बाई के यहाँ हुआ था। बचपन का नाम ‘मोहनदास’ रखा गया। प्यार से लोग मोहना भी कहते थे। करमचन्द गाँधी की तीन पत्नियाँ काल-कवलित होती गईं और चैथी पत्नी पुतली बाई से उन्हें तीन पुत्र और एक पुत्री हुईं। सबसे बड़े पुत्र लक्ष्मीदास, तब पुत्री गोली बेन, फिर कर्षणदास और सबसे छोटे मोहनदास। गुजरात की परंपरा के अनुसार इनका नाम हुआ ‘मोहनदास करमचन्द गाँधी‘। 

मोहनदास की प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा पोरबन्दर में ही हुई। मगर सात वर्ष की अवस्था में वे अपने पिता के पास राजकोट चले आये, जहाँ पर उनके पिता स्थानीय कोर्ट के सदस्य थे। बचपन में हरिश्चन्द्र नाटक देख कर वे भाव-प्रवण हो उठे और सत्य के प्रति दृढ़ निष्ठा का बीजारोपण उनके हृदय में हो गया। मोहनदास पढ़ने में साधारण थे, लिखावट भी अच्छी नहीं थी, फिर भी वे एक शान्त चित्त होनहार छात्र के रूप में विद्यालय में गिने जाते थे। एक बार इनके विद्यालय में एक अंग्रेज स्कूल इंस्पेक्टर के आने पर सभी विद्यार्थियों को पाँच अंग्रेजी शब्दों की स्पेलिंग लिखने के लिए दी गई। प्रधानाचार्य ने देखा कि मोहनदास की स्पेलिंग 'kettle’ गलत है। उन्होंने पैर दबा कर मोहनदास को इशारा किया कि बगल वाले की स्पेलिंग देखकर अपना सुधार कर लें। लेकिन मोहनदास ने ऐसा नहीं किया। जब प्रधानाचार्य ने उन्हें इसके लिए डाँटा तो उन्होंने इस प्रकार से नकल करने की प्रक्रिया को असंगत बतलाया। यह थी उनके बचपन की सत्य-निष्ठा।  

उनकी अभी प्रारम्भिक शिक्षा ही चल रही थी कि मात्र तेरह वर्ष की अवस्था में उनकी शादी पोरबन्दर के ही श्री गोकुलदास जी की पुत्री कस्तूर बाई से कर दी गई। एक साथ ही इनके बड़े भाई कर्षणदास और चाचा के लड़के की शादी हुई। कस्तूर बाई एक धर्मपरायण महिला थीं। मोहनदास का परिवार खानदानी वैष्णव था। इनके पिताजी के पास जैन साधु भी आया करते थे। सत्य के साथ अहिंसा का बीजारोपण भी उनके हृदय में होने लगा था। 

मोहनदास ने 18 वर्ष की अवस्था में मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद वे भावनगर के श्यामलदास काॅलेज में नामांकन कराये। श्यामलदास काॅलेज से बी0 ए0 पास करने के बाद उनके परिवार के हितैषी पं0 भाओ जी दामो और जोशी जी के परामर्श से बैरिस्टरी पढ़ने के लिए लंदन भेजने पर सहमति बनी। पिता की छाया उठ चुकी थी। मोहनदास एक पुत्र के पिता भी बन चुके थे। बड़े भाई लक्ष्मीदास जी ने अर्थ की व्यवस्था की। मोहनदास ने माँ को वचन दिया कि मांस, शराब और महिला से सदा दूर रहेंगे। इस तरह 4 सितम्बर 1888 को मोहनदास बैरिस्टरी पढ़ने के लिए ‘बम्बई’ से विलायत के लिए रवाना हुए। यह इस समय की एक क्रान्तिकारी घटना थी। समाज के लोग ऐसी यात्रा का घोर विरोध करते थे। मगर मोहनदास की विलायत-यात्रा पूरी हुई। वे वहीं बैरिस्टरी पढ़ने लगे। 

इंग्लैंड के खान-पान और रहन-सहन से वे काफी परेशान रहने लगे। एक बार मांस खाने का आग्रह होने पर उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि यदि मांस के बिना इंग्लैंड में रहना संभव नहीं होगा तो वे भारत लौट जायेंगे, लेकिन माँ को दिया हुआ वचन नहीं तोड़ेंगे। यह बात दूसरी थी कि कई सज्जन उन्हें सामिष भोजन की महत्ता बतलाकर उन्हें उसकी ओर आकृष्ट करना चाहते थे। इसी समय एक दिन घूमते हुए इंग्लैंड के एक रेस्तराँ पर उनकी नजर पड़ी। वह निरामिष रेस्तराँ था। वहाँ पर उन्हें शो केस में मि0 साल्ट की लिखी निरामिष भोजन के समर्थन में एक पुस्तक दिखी। वे उसे एक श्वाँस में ही पढ़ गये और यहीं पर उनके द्वन्द्व की समाप्ति हो गई। अब वे सैद्धान्तिक रूप से निरामिष भोजन के पक्षधर बन गये। तीन वर्ष बाद इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर 12 जून 1891 को मोहनदास भारत के लिए प्रस्थान किये। उनका छात्र-जीवन इस डिग्री के साथ ही समाप्त हो गया और वे अब कर्म-क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए तैयार थे। 

बम्बई के बन्दरगाह पर उतरते ही मोहनदास को पता चला कि उनकी माँ भी चल बसी हैं। पिता की मृत्यु सन् 1881 में ही हो चुकी थी। जिस माँ के सपने को साकार कर मोहनदास बैरिस्टर बनकर भारत आये थे, उस माँ की छाया उन्हें नहीं मिलेगी, यह जान कर उनका हृदय व्यथित हो उठा। माँ की याद में आँसू भी शायद सूख गये। अभी मात्र 22 वर्ष की अवस्था में उनसे पहले पिता और अब माँ का साथ छूट गया। यह उनके लिए एक वज्राघात के समान था। 

अब मोहनदास ने बम्बई में बैरिस्टरी शुरू की। पहली बार एक केस मिला। लेकिन मामले की जिरह के लिए उठने के साथ ही उनका सिर घूम गया। जिरह नहीं कर सके। अपने मुवक्किल को तीस रूपये वापस कर दिये। वकालत जम नहीं पायी। बम्बई में केवल छः माह रहने के बाद राजकोट आ गये। यहाँ पर भी कामचलाऊ केस मिलते थे।  इसी बीच पोरबन्दर के एक व्यवसायी अब्दुला एण्ड कम्पनी के हिस्सेदार सेठ अब्दुल करीम झाबेरी की ओर से दक्षिण अफ्रिका में चल रहे एक दीवानी केस में नियुक्त होने का प्रस्ताव आया। एक वर्ष की अवधि के लिए वहाँ जाने के लिए राजी हो गये। मगर कौन जानता था कि उन्हें बाइस वर्षों तक वहीं रहना पड़ेगा। 

सन् 1893 भारत के इतिहास में कई महत्त्वपूर्ण घटनाओं के लिए चर्चित है। इसी वर्ष स्वामी विवेकानन्द 30 वर्ष की उम्र में शिकागो की धर्म-सभा में भाग लेने अमेरिका के लिए रवाना हुए थे। इसी वर्ष महर्षि अरविन्द 14 वर्षों तक इंग्लैंड में रहने के बाद 21 वर्ष की उम्र में भारत लौट रहे थे। इसी वर्ष श्रीमती ऐनी बेसेन्ट भी इंग्लैंड से भारत आ रही थीं। इसी वर्ष मोहनदास 24 वर्ष की उम्र में भारत से दक्षिण अफ्रिका जा रहे थे। भारत का भावी इतिहास मानो सन् 1893 के इर्द-गिर्द घूम रहा था। 

अप्रैल 1893 में मोहनदास अफ्रिका के लिए रवाना हुए। जहाज डरबन पहुँचा, जहाँ उन्हें लेने के लिए दादा अब्दुल सेठ स्वयं आये थे। इस स्थान को नेटाल भी कहते हैं। कहा जाता है कि सर्वप्रथम सन् 1860 में भारतीय मजदूरों को एक ऐग्रीमेंट के तहत दक्षिण अफ्रिका भेजा गया था। यही ‘ऐग्रीमेंट’ शब्द विकृत हो कर गिरमिटिया बन गया और भारत से जाने वाले मजदूर ‘गिरमिटिया मजदूर’ कहलाने लगे। दक्षिण अफ्रिका में भारत से आये लोगों को यूरोपियन लोग कुली कहते थे। मोहनदास को सेठ अब्दुल अपने केस के सिलसिले में कोर्ट मंे ले गये। मजिस्टेªट ने उनसे पगड़ी खोलने के लिए कहा। मोहनदास इसे अस्वीकार करते हुए कोर्ट से बाहर आ गये। प्रथम दिन ही इस घटना ने उन्हें कुछ सोचने के लिए बाध्य कर दिया। दक्षिण अफ्रिका मंे भारतीयों की दुरवस्था से वे धीरे-धीरे परिचित होने लगे थे। पगड़ी के बदले हैट पहनना स्वीकार न करके मोहनदास ने जिस निर्भीकता का परिचय दिया, उससे श्वेत अधिकारियों के कान खड़े हो गये। इस घटना के एक सप्ताह बाद ही उन्हें केस के सिलसिले में ट्रान्सवाल की राजधानी प्रिटोरिया जाना पड़ा। 

डरबन में प्रथम श्रेणी का टिकट लेकर वे टेªन से रवाना हुए। अभी नेटाल की राजधानी पिटर मारिज वुर्ग स्टेशन पर टेªन पहुँची ही थी कि एक यूरोपियन प्रथम श्रेणी के डब्बे में एक काले आदमी को देखकर रेलवे-कर्मचारी को बुला लाया। रेलवे कर्मचारी ने उन्हें तृतीय श्रेणी में जाने का आग्रह किया। मगर मोहनदास ने प्रथम श्रेणी का टिकट दिखाते हुए वहाँ से हटने के लिए इन्कार कर दिया। कर्मचारी ने पुलिस बुलाकर उन्हें टेªन से जबरदस्ती उतार दिया। टेªन चली गई। मोहनदास वेटिंग रूम में ठहर गये। उनके मन में इस असमानता और अन्याय के प्रति विद्रोह भर उठा। शायद उनके मन में यहीं पर सत्याग्रह के बीज का बपन हो चुका था। 

इस छोटी-सी घटना ने मोहनदास को भीतर से बदल दिया था और उन्होंने इस सामाजिक अन्याय को दूर करने का मन-ही-मन संकल्प ले लिया था। मोहनदास ने इस घटना के प्रतिरोध में हर जगह पत्र लिखा। समाचार आग की तरह फैल गया। कई भारतीय उनसे मिलने आये। उन लोगों की कष्ट भरी बातें सुनकर मोहनदास इस अत्याचार से लड़ने के लिए दृढ़-संकल्पित हो उठे। मगर अभी तो इस यात्रा का यह एक प्रारम्भिक टेªलर था। चाल्र्स टाउन तक टेªन से आने के बाद जोहान्सबर्ग की यात्रा घोड़ागाड़ी से करनी पड़ती है। दक्षिण अफ्रिका में मोहनदास एक कुली बैरिस्टर थे। उन्हें घोड़ागाड़ी के कोचवान के पास बैठना पड़ा। तभी एक श्वेतांग की धूम्रपान करने की इच्छा हुई। वह आकर इन्हें उस स्थान से भी हटाने लगा। मोहनदास के अस्वीकार करने पर उनके साथ बदसलूकी की गई। उन पर हाथ भी उठाये गये। 

दक्षिण अफ्रिका में इन कटु अनुभवों से उनका हृदय विद्रोह कर उठा। फिर जोहान्सबर्ग से प्रिटोरिया के लिए टेªन-यात्रा प्रथम श्रेणी में शुरू हुई। फिर ट्रेन के गार्ड द्वारा तृतीय श्रेणी में जाने का फरमान जारी हुआ। मगर एक अंग्रेज यात्री के हस्तक्षेप से उन्हें टेªन से नहीं उतरना पड़ा। प्रिटोरिया में किसी तरह एक होटल में जगह मिली। होटल मालिक ने कहा कि आपको अपना खाना अपने कमरे में ही खाना होगा अन्यथा यूरोपियन लोग आपत्ति करेंगे। प्रिटोरिया में उन्हें करीब एक वर्ष रहना पड़ा। 

प्रिटोरिया में रहते हुए उन्हें अफ्रिका की रंग-भेद नीति का जगह-जगह सामना करना पड़ा। भारतीयों के कष्ट से अब वे वाकिफ हो चुके थे। इसी काल-खण्ड में उनके जीवन को दो पुस्तकों ने बहुत प्रभावित किया। पहली पुस्तक थी-काउण्ट टाॅल्स्टाॅय की पुस्तक ‘स्वर्ग तुम्हारे ही भीतर है’ और दूसरी रस्किन की पुस्तक ‘अण्टु दिस लास्ट।’ इन पुस्तकों से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्हें लगा कि जीवन की कुंजी उन्हें मिल गई है। मोहनदास के भीतर अब सत्याग्रह का पौधा पनपने लगा था। 

इधर दक्षिण अफ्रिका की रंग-भेद नीति अपने चरम पर थी। फुटपाथ पर चलने का अधिकार भारतीयों को नहीं था। रात्रि बारह बजे के बाद बाहर निकलने के लिए अनुमति-पत्र लेना पड़ता था। मोहनदास को भी एक दिन फुटपाथ पर चलते समय एक संतरी ने धक्का देकर उतार दिया। भारत के मोहनदास दक्षिण अफ्रिका के गाँधीभाई के नाम से मशहूर हो चले। अब गाँधी भाई ने दादा अब्दुला सेठ के मुकदमे में सुलह की पहल की। दोनों पक्षों में समझौता हो गया। गाँधीभाई प्रिटोरिया से फिर डरबन आ गये। अब वे भारत लौटने का निश्चय कर रहे थे। 

इसी बीच नेटाल विधान सभा में भारतीयों को वोट देने का अधिकार छीनने के बारे में एक बिल पेश होने की खबर पढ़कर वे चिन्तित हो उठे। वहाँ के भारतीयों के आग्रह पर गाँधीभाई वहाँ एक महीना और ठहरने के लिए राजी हो गये। यहीं से उनकी सार्वजनिक कार्यों में अभिरुचि बढ़ी और समाज-सेवा का कार्य उन्हें अपनी ओर खींचने लगा। इस बिल के विरोध में अध्यक्ष को ज्ञापन दिया गया। कुछ आशा की किरण जगी। मगर वह काला कानून पास हो गया। वहाँ पर रहने वाले भारतीयों के अधिकार पर यह एक कुठाराघात था। दक्षिण अफ्रिका मंे रहने वाले भारतीयों में एकता का सूत्र मजबूत होने लगा। राजनैतिक अधिकार के लिए होने वाले संघर्ष में अब गाँधी भाई उन सबके साथ थे। गाँधी भाई अब नेटाल में ही बैरिस्टर के रूप में कार्य करने के लिए सहमत हो गये। करीब बीस भारतीय व्यवसायियों ने उन्हें अपना बैरिस्टर मान कर एक साल के फीस की पेशगी भी दे दी। 

दक्षिण अफ्रिका में अब एक नये युग का सूत्रपात होने लगा। 22 अगस्त 1894 को नेटाल भारतीय कांग्रेस की स्थापना की गई। गाँधी भाई इसके संचालक बने और 25 वर्ष की उम्र में वे दक्षिण अफ्रिका में रहने वाले भारतीयाें के एकछत्र नेता बन गये। इस तरह तीन वर्षों तक दक्षिण अफ्रिका में बैरिस्टर की हैसियत से रहते हुए उन्होंने वहाँ पर व्याप्त सामाजिक असमानता के प्रति प्रबुद्ध वर्गों में जागरूकता पैदा की। अपने लेखों के माध्यम से, प्रतिवेदनों के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश सरकार के कानों तक इस रंग-भेद नीति के विरोध में आवाज पहुँचायी। भारतीयाें पर लादे गये गैर कानूनी टैक्सों के विरोध में भी नेटाल भारतीय कांग्रेस द्वारा आन्दोलन शुरू किया गया। सन् 1896 में गाँधीभाई भारत आ गये। यहाँ राजकोट में रहते हुए दक्षिण अफ्रिका में भारतीयांे की स्थिति पर उन्होंने एक पुस्तिका लिखी। जगह-जगह सभाएँ की गई। इसी क्रम में बम्बई में गोखले से भी भेंट हुई। तिलक और भंडारकर से भी परिचय का सूत्र बढ़ा। 

दक्षिण अफ्रिका से बुलाहट आ रही थी। इस बार वे अपनी पत्नी, दो बच्चे और एक भांजे को लेकर दक्षिण अफ्रिका के लिए 1896 के अन्त में पानी के जहाज से रवाना हो गये। दक्षिण अफ्रिका में पार्लियामेंट का अधिवेशन जनवरी 1897 में होना था, इसीलिए गाँधीभाई इस बार अपने परिवार के साथ वहीं पहुँच गये थे। यह एक संयोग ही था कि इस बार जहाज से करीब 800 भारतीय वहाँ पहुँचे थे। यूरोपियनों में यह समाचार नागवार गुजरा। शायद भारतीयाें की जनसंख्या बढ़ाने के लिए इसे गाँधी की योजना समझी गई। गाँधीभाई अब खुले दिल से सार्वजनिक कार्यों में हाथ बँटाने लगे। करीब चार वर्षों तक दक्षिण अफ्रिका के बैरिस्टर के साथ सामाजिक विषमताओं को दूर करने के लिए और इस अन्याय के विरोध में आवाज बुलन्द करने के लिए वे क्रियाशील रहे। तभी एक बार फिर सन् 1901 में उन्हें भारत आना पड़ा। शर्त केवल इतनी ही थी कि जब भी जरूरत पड़ेगी वे फिर दक्षिण अफ्रिका आ जायेंगे। इस बार विदाई समारोह में उन्हें तथा उनकी पत्नी को कई मूल्यवान् उपहार दिए गए, लेकिन गाँधीभाई ने उन्हें विनम्रता से लौटा दिया। अपरिग्रह की भावना का यह परिचायक था। 

भारत आने पर वे कांग्रेस के मंच पर भारतीयों की दुर्दशा पर बहस चलाते रहे। सन् 1901 में ही कलकत्ता अधिवेशन में भाग लिये। गाँधीजी ने दक्षिण अफ्रिका सम्बन्धी  प्रस्ताव को पढ़ा, जिसका ‘गोखले जी’ ने समर्थन किया। गाँधीजी का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार हो गया। भारत में कई बड़े-बड़े नेताओं का दर्शन किए। भारत में अभी गाँधीभाई उतने चर्चित नहीं हुए थे। गोखले जी उन्हें बहुत चाहते थे। उन्होंने शायद इस युवा में संभावनाओं को घनीभूत होते देख लिया था। 

मगर इस बार भी गाँधीभाई केवल छः माह ही भारत रह सके। अफ्रिका से तार आया कि यहाँ पर चेम्बरलेन आने वाले हैं, इसलिए आप शीघ्र आ जायें। इस बार गाँधीजी परिवार को भारत में ही छोड़ कर डरबन चले गये। सन् 1902 के अन्त में वे डरबन पहुँचे। भारत में जितने दिन रहे एक तरह से पूरा भ्रमण करके यहाँ के कांग्रेसी नेताओं से वे मिले और बहुत बातों को नजदीक से जाने। डरबन के चेम्बरलेन (ब्रिटेन के औपनिवेशिक सेक्रेटरी) से भेंट कर दक्षिण अफ्रिका में रहने वाले भारतीयाें की समस्याओं से उन्हें अवगत कराया। अब वे समाज-सेवा के कार्य में अधिक ध्यान देने लगे। इसी समय  भारतीय दर्शन, गीता और अन्य धर्मों के ग्रंथों को पढ़ने का अवसर मिला। गीता उनके जीवन की सहचरी बन गई। एक वर्ष बाद ही पत्नी और बच्चों को जोहान्सबर्ग बुला लिये। अब वे जोहान्सबर्ग में ही बैरिस्टरी भी करने लगे। धर्म के वास्तविक रूप को जानकर उसे जीवन में उतारने का प्रयत्न करने लगे। जीवन में पहले सत्य का प्रयोग किये और फिर सत्याग्रह को आधार बनाकर अपने आन्दोलनों को मूर्त रूप देने लगे। गाँधीभाई का नाम दक्षिण अफ्रिका में एक सर्वमान्य नेता के रूप में उभर आया। उनकी ख्याति की ध्वनि भारत तक आ पहुँची। अफ्रिका के काले कानूनों के खिलाफ उन्होंने बिगुल फूँक दिया। सत्याग्रह के द्वारा जन-आन्दोलन खड़ा कर दिया। सन् 1904 में ‘इंडियन ओपीनियन’ नामक साप्ताहिक अखबार निकाला, जिसके सम्पादक श्री मनसुख लाल नाजर हुए। उनके द्वितीय पुत्र मणिलाल ने भी कुछ दिनों तक इसका सम्पादन किया। 

गाँधीजी को चार पुत्ररत्नों की प्राप्ति हुई। सबसे बड़े हरिलाल फिर मणिलाल, रामदास और सबसे छोटे देवदास। हरिलाल और मणिलाल का जन्म भारत में हुआ था और रामदास तथा देवदास का जन्म अफ्रिका में। जोहान्सबर्ग से 30 किलोमीटर की दूरी पर फिनिक्स में सत्याग्रहियों के लिए एक आश्रम बनवाया गया था। इस फिनिक्स आश्रम के सारे कार्य सभी मिल-जुल कर करते थे। गाँधीजी ने भी पत्नी और बच्चों को भी इसी फिनिक्स फार्म में रहने के लिए भेज दिया था। गाँधीजी टाॅल्स्टाॅय से बहुत प्रभावित थे। टाॅल्स्टाॅय से उनका पत्राचार भी होता रहा। नवम्बर 1910 में टाॅल्स्टाॅय का निधन हो गया। गाँधीजी के एक मित्र दक्षिण अफ्रिका के जर्मन शिल्पकार हरमन कालेनवाक थे, जिनकी 1100 एकड़ जमीन जोहान्सबर्ग से 21 किलोमीटर की दूरी पर थी। कालेनवाक ने वह जमीन आश्रम के लिए दे दी। यहीं पर टाॅल्स्टाॅय फार्म की स्थापना की गई। फिनिक्स फार्म के लोग भी अब टाॅल्स्टाॅय फार्म में आकर रहने लगे। पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे इस टाॅल्स्टाॅय फार्म में एक संयुक्त परिवार की तरह रहते थे। वहाँ पर रहने वाले गरीबी को गले लगाते थे और आत्मनिर्भरता से रहते थे, सत्याग्रह और अहिंसा का अभ्यास सिखलाया जाता था। यहाँ पर एक नयी जीवनपद्धति विकसित होने लगी थी। सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह का दर्शन इस आश्रम में पलने लगा था। 

दक्षिण अफ्रिका में भारतीयाें पर लागू होने वाले काले कानूनों की लम्बी शृंखला है। इस काले कानून के विरोध में सत्याग्रह करने के लिए गाँधी जी को जनवरी 1908 में पहली बार दो माह की सजा दी गई। उन्हें जोहान्सबर्ग जेल में रखा गया। गाँधीजी सन् 1909 में एक डेपुटेशन में भारतीयांें की समस्या लेकर विलायत भी गये। वहाँ पर कई नेताओं से मिले। विलायत से दक्षिण अफ्रिका लौटते समय उन्होंने ‘हिन्द स्वराज्य’ नाम की एक पुस्तक लिखी। पहले यह गुजराती में लिखी गई। बाद में कई भाषाओं में इसके अनुवाद हुए। आन्दोलन की एक झलक इस पुस्तक में दिखलाई पड़ती है। सन् 1912 में गोखले जी दक्षिण अफ्रिका आये। गाँधीजी ने वहाँ की दुःखद स्थिति से उन्हें अवगत कराया। कई जगह सभा भी हुई। गोखले जी ने अधिकारियों से बात करने के बाद गाँधीजी को बतलाया कि काला कानून समाप्त कर दिया जायेगा तथा अतिरिक्त टैक्स भी हटा लिया जायेगा। मगर गाँधीजी ने इस बारे में अपना संदेह जताया कि शायद ही यह सरकार अपना वचन पूरा करेगी। आखिर वहीं हुआ जो गाँधीजी सोचते थे। 

सन् 1913 में फिर एक बार भारतीय विवाह-पद्धति की मान्यता रद्द कर दी गई। सत्याग्रह का सिलसिला शुरू हुआ। इस बार करीब ढाई हजार मजदूर सत्याग्रह में भाग लिये। गाँधीजी के साथ कालेनवाक और पोलक भी गिरफ्तार हुए। इस बार गाँधीजी को नौ महीने की सजा हुई। मगर सत्याग्रह थमा नहीं। आखिर सरकार को झुकना पड़ा। अन्त में जून 1914 में तीन पौंड वाला टैक्स और भारतीय विवाह के विरोध में बना कानून रद्द हो गया। सत्याग्रह की विजय हुई। गाँधीजी के सत्याग्रह का प्रयोग सफल हो गया। मात्र एक वर्ष के लिए सन् 1893 में भारत से दक्षिण अफ्रिका जाने वाले गाँधी को वहाँ 21 वर्षों से भी अधिक रहना पड़ा। 

जुलाई 1914 में गाँधीजी दक्षिण अफ्रिका से भाव-प्रवण स्थिति में विदा हुए। गोखले जी के निर्देश से वे पहले विलायत गये और वहाँ पर शुभेक्षुओं में सर ऐंड्रयूज़ तथा पियर्सन से मिले। साथ में कस्तूरबा और कालेनवाक भी थे। प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटेन भी कूद रहा था। गाँधीजी वहाँ भी सेवा-दल गठित करके उन लोगों से युद्ध में आहत लोगों की सेवा का भार लेने का आग्रह किया। आखिर लन्दन होते हुए 9 जनवरी 1915 को भारत वापस आ गये।
 
दक्षिण अफ्रिका में करीब 22 वर्षों तक कार्य करने के बाद गाँधीजी जब 9 जनवरी 1915 को बम्बई पहुँचे तो वहाँ पर उनका भव्य स्वागत किया गया। विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा दिये गये स्वागत समारोह की अध्यक्षता श्री फिरोज शाह मेहता ने की और गुजराती समाज द्वारा आयोजित समारोह की अध्यक्षता मुहम्मद अली जिन्ना ने की। 

गाँधीजी दक्षिण अफ्रिका में कार्यरत थे मगर भारत की स्वतन्त्रता के लिए सोचते रहते थे। इसी सोच का परिणाम उनकी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज्य’ है, जो सन् 1909 में लिखी गई थी। दक्षिण अफ्रिका में आश्रम का प्रयोग और सत्याग्रह का स्वरूप इन दोनों को व्यवहार रूप में गाँधीजी ने उतारा था, इसलिए भारत में स्वतन्त्रता के लिए कार्य करने का उनके पास लम्बा अनुभव था। उस समय  भारत की स्वतन्त्रता की बात करने वाली एक मात्र राजनैतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस थी, जिनके जन्मदाता एक अंग्रेज आॅक्टेविमस ह्यूम थे तथा विलियम वेडरवन, डा0 ऐनी बेसेण्ट जार्ज मूल आदि विदेशी इसके अग्रणी नेता थे। भारतीय नेताओं में बाल गंगाधर तिलक, गोपालकृष्ण गोखले, लाला लाजपत राय, पंडित मदनमोहन मालवीय, देशबन्धु चितरंजन दास, दादा भाई नौरोजी आदि प्रमुख थे। भारत आने के बाद गाँधीजी देश के विभिन्न भागों में दौरा किये। दक्षिण अफ्रिका में मोहनदास ‘गाँधी भाई’ कहलाये तो भारत में आने पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्हें ‘महात्मा‘ कहा तथा चम्पारण सत्याग्रह की सफलता के बाद वे पूरे देश में ‘महात्मा गाँधी’ कहलाने लगे। नजदीक के लोगों ने उन्हें ‘बापू’ भी कहा जिसका अर्थ ‘पिता’ होता है और अन्त में वे ‘राष्ट्रपिता’ कहलाये। 

गाँधीजी  फरवरी 1915 में शान्ति-निकेतन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिले और वहाँ की शिक्षा-पद्धति से काफी प्रभावित हुए। सन् 1916 के कांग्रेस अधिवेशन में वे शामिल हुए। यह अधिवेशन इसलिए महत्त्वपूर्ण था कि इसमें 8 वर्षों बाद ‘तिलक’ जी भी भाग लेने आ गये थे और कांग्रेस के दोनों दल एक साथ मंच पर विद्यमान थे। 

इसी अधिवेशन में बिहार से श्री बृजकिशोर प्रसाद और डा0 राजेन्द्र प्रसाद के साथ बहुत से प्रतिनिधि भाग लेने गये थे। इसमें चम्पारण जिले के एक सीधे किसान श्री राजकुमार शुक्ला भी थे। शुक्ला जी चम्पारण के किसानों की दुर्दशा से कांग्रेस को अवगत कराना चाहते थे। उनकी दृष्टि गाँधीजी पर पड़ी और उन्होंने इस सम्बन्ध मंे उनसे प्रश्न उठाने का आग्रह किया। गाँधीजी का सीधा-सा उत्तर था-‘‘खुद देखे बिना इस विषय पर मैं राय नहीं दे सकता। आप खुद यहाँ सभा में बोलिएगा।’’ 

कांग्रेस अधिवेशन में प्रस्ताव बाबू  बृजकिशोर प्रसाद ने प्रस्तुत किया। राजकुमार शुक्ला जी भी कुछ बोले। महासभा में सहानुभूति-प्रस्ताव पास हुआ। मगर शुक्ला जी तो गाँधीजी को चम्पारण ले जाने के लिए अडिग थे। वे गाँधी जी का पीछा करते रहे। अन्त में 1917 में कलकत्ता अधिवेशन में आने के लिए उनसे गाँधीजी ने कहा। राजकुमार शुक्ला जी भी कलकत्ता आ गये। डा0 राजेन्द्र प्रसाद भी इस अधिवेशन में आये। मगर उन्हें भी इसकी भनक नहीं मिली कि गाँधीजी चम्पारण जाने वाले हैं। आखिर 9 अप्रैल 1917 को कलकत्ता से गाँधीजी को लेकर राजकुमार शुक्ला जी पटना के लिए रवाना हुए। वे गाँधीजी को लेकर पटना में राजेन्द्र बाबू के निवास पर गए। मगर राजेन्द्र बाबू कलकत्ता से ही पुरी चले गये थे। राजेन्द्र बाबू के नौकर इन्हें पहचानते नहीं थे। बाहर में ठहरने का संकेत दिया। बाहर के ही शौचालय में जाने का इशारा किया। गाँधी जी को अपने मित्र मौलाना मजहरुल हक की याद आयी जो साथ ही लन्दन में पढ़े थे। फिर तो आनन-फानन में हक साहब अपनी गाड़ी लेकर आ गये और गाँधीजी को अपने बंगले पर ले गये। वहाँ से राजकुमार शुक्ला जी गाँधीजीे को लेकर मोतीहारी के लिए टेªन से चले। 

मुजफ्फरपुर में आचार्य कृपलानी प्रोफेसर थे। गाँधीजी को स्टेशन से अपने घर ले गये। फिर दो-तीन दिन बाद यह टोली वहाँ से मोतीहारी पहुँची। यहाँ पहुँच कर नील की खेती करने वाले किसानों का दुःख-दर्द सुन कर गाँधी जी मर्माहत हो उठे। उन्होंने सत्याग्रह-आन्दोलन की शुरुआत कर दी। 

गाँधीजी के प्रयास से निलहांे के अत्याचार से किसानों को मुक्त करने के लिए ब्रिटिश-सरकार को एक कमीशन की नियुक्ति करनी पड़ी। तब तक डा0 राजेन्द्र प्रसाद, डा0 अनुग्रह नारायण सिंह, श्री बृजकिशोर प्रसाद, गोरख प्रसाद, धरणीधर प्रसाद भी आ गये थे। चम्पारण-सत्याग्रह दो वर्षों (1917-18) तक चला। 

गाँधीजी ने भारत में अपने राजनैतिक सघंर्ष की शुरुआत चम्पारण से ही की। कहा जाता है कि गाँधीजी इस क्षेत्र में करीब 175 दिन रहे। करीब दो हजार किसानों के बयान दर्ज किये गये। अन्त में 4 अक्टूबर 1919 को ब्रिटिश-सरकार को झुकना पड़ा और यह घोषणा करनी पड़ी कि अब तिनकठिया कानून लागू न होगा और जोर-जुल्म से नील की खेती नहीं करायी जायेगी। 

इस फैसले पर गाँधीजी ने बिहार के तत्कालीन गवर्नर सर एडवर्ड गेट की प्रशंसा भी की। भारत में गाँधीजी को चम्पारण से किये गये सत्याग्रह आन्दोलन से जो सफलता मिली उससे उनका राजनैतिक कद काफी ऊँचा हो गया। सारे देश में वे अब ‘महात्मा गाँधी‘ के रूप में विख्यात हो गये। इसी आन्दोलन के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक बड़े नेता के रूप में उभर कर आये।  

चम्पारण के बारे में महात्मा गाँधी ने अपनी आत्मकथा में स्वयं लिखा है-‘‘बिहार ने ही मुझे सारे हिन्दुस्तान में जाहिर किया। इससे पहले तो कोई मुझे जानता भी नहीं था। बीस साल अफ्रिका में रहने के कारण मैं हब्शी-सा बन गया था। उसके बाद मैं चम्पारण आया और सारा हिन्दुस्तान जाग उठा। पहले मैं जानता भी नहीं था कि चम्पारण कहाँ है? लेकिन जब यहाँ आया तो ऐसा मालूम हुआ कि मैं बिहार के लोगों को सदियों से जानता था और वे भी मुझे पहचानते थे। मैं समझता हूँ कि बिहार और चम्पारण के लिए इससे बढ़कर गौरव की बात कोई हो ही नहीं सकती।’’

यह बात सही है कि महात्मा गाँधी ने प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश-सरकार का साथ देने का निश्चय किया था और इसके लिए सेना में भर्ती होने का आह्वान भी किया था। युद्ध में ब्रिटेन तथा मित्र-राष्ट्रों की विजय के बाद उनके मन में आशा जगी थी कि अब शायद भारत को स्वायत्त-शासन का अधिकार मिलेगा। मगर ठीक इसके विपरीत भारत को मिला-रौलेट ऐक्ट, जिसके अन्तर्गत भारतीयों की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और कम कर दी गई थी। सारा देश इस रौलेट ऐक्ट के विरोध में जाग उठा। 

गाँधीजी ने इसके विरोध में उपवास और हड़ताल की घोषणा कर दी। सभी वर्गों का समर्थन मिलने से हड़ताल को आशातीत सफलता मिली। हिन्दू-मुस्लिम एकता का नजारा यह था कि प्रख्यात आर्य-समाजी स्वामी श्रद्धानन्द को दिल्ली के जामा मस्जिद में भाषण देने के लिए आमन्त्रित किया गया। सारा देश रौलेट ऐक्ट के विरुद्ध मंें एकजुट होकर खड़ा हो गया। इधर अंग्र्रेज सरकार की दमन की कार्रवाई भी बढ़ने लगी। दिल्ली-पंजाब और देश के अन्य भागों में हिंसक घटनाएँ भी हुई। 

पंजाब में 13 अप्रैल को गुरु गोविन्द सिंह द्वारा ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की स्मृति में सिक्खों का बैसाखी का पावन पर्व था। 11 अप्रैल 1919 को जनरल डायर अमृतसर में अधिकारी बनकर आया और आते ही निषेधाज्ञा लागू कर दी। आम जनता को इसकी कोई जानकारी नहीं थी। जालियाँवाला बाग के एक घिरे स्थान पर हजारों लोग एक़त्र थे। इसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे-बैसाखी पर्व को मनाने के लिए। तभी जनरल डायर के आदेश से निहत्थी भीड़ पर मशीनगनों से बौछार होने लगी। ऐसा मौत का ताण्डव पूर्व में कभी देखने को नहीं मिला था। मानवता इस बर्बर कांड से थर्रा उठी। यह नृशंस हत्याकांड अंग्रेजी-शासन का एक काला धब्बा बन गया। शायद अंग्रेजी-शासन के ताबूत में एक मजबूत कील भी उसी दिन ठुक गयी थी।

जालियाँवाला बाग के इस नृशंस हत्याकांड के विरोध में गाँधीजी ने अपना ‘केसरे हिंद मेडल’ सरकार को वापस कर दिया। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी ‘नाइट सर’ की उपाधि लौटा दी। इधर अंग्र्रेजों का दमन बढ़ता ही जा रहा था। जनरल डायर को अंग्रेजों द्वारा पुरस्कृत किया जा रहा था। इसी बीच खिलाफत आन्दोलन की आहट आयी।  भारतीय मुसलमानों ने भी विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ दिया था। तुर्की में खलीफा के अधिकार को कम न करने के लिए भारत में खिलाफत आन्दोलन चलाया गया। महात्मा गाँधी ने इस आन्दोलन में अपना पूर्ण समर्थन दिया। इधर जालियाँवाला कांड की बर्बरता और खिलाफत आन्दोलन के प्रति अंग्रेजों की निष्क्रियता ने गाँधीजी को कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दिया। 

महात्मा गाँधी 1920 के कलकत्ता अधिवेशन में ‘असहयोग आन्दोलन‘ का प्रस्ताव रखे। असहयोग आन्दोलन का अर्थ था-अपनी उपाधियाँ लौटा देना, स्कूल, काॅलेज, अदालत, कौंसिल न जाना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा किसी प्रकार का टैक्स नहीं देना। महात्मा गाँधी का यह असहयोग आन्दोलन एक विप्लव का विस्फोट था। इस अधिवेशन में ’तिलक‘ का अभाव गाँधीजी को खल रहा था। सन् 1916 में गोखले का आकस्मिक निधन और फिर सन् 1920 में तिलक का निधन राष्ट्र के लिए एक अपूरणीय क्षति थी। अन्त में इस अधिवेशन में निर्णय हुआ कि अगले नागपुर के अधिवेशन में साधारण सभा में असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव पारित किया जायेगा। आखिर दिसम्बर 1920 के नागपुर अधिवेशन में महात्मा गाँधी के द्वारा प्रस्तावित असहयोग आन्दोलन को स्वीकृत कर लिया गया। गाँधीजी अब कांग्रेस के एकछत्र नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। महात्मा जी का यह अहिंसक असहयोग का आन्दोलन था। 

‘यंग इंडिया’ में महात्मा गाँधी ने कई लेख लिखे, जिससे अंग्रेज-सरकार बौखला उठी। 10 मार्च 1922 को उन्हें साबरमती आश्रम से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके पूर्व असहयोग आन्दोलन में देश के कई नेता गिरफ्तार किये जा चुके थे। साबरमती आश्रम का भी अपना एक इतिहास है। इस आश्रम की स्थापना दक्षिण अफ्रिका के फिनिक्स आश्रम और टाॅल्स्टाॅय आश्रम की तर्ज पर ही की गई थी। अहमदाबाद के एक सुप्रसिद्ध सामाजिक व्यक्ति श्री जीवनलाल बैरिस्टर का मकान कोचरब नामक स्थान में था जो उस समय अहमदाबाद के बाहर था। उसी मकान में 23 मई 1915 को साबरमती नदी के किनारे ‘साबरमती आश्रम’ की स्थापना की गई। इसे सत्याग्रह आश्रम भी कहा जाता था, क्योंकि यहाँ पर रहने वाले हर व्यक्ति को सत्य का आचरण करना पड़ता था-एक निर्मल जीवन व्यतीत करने का संकल्प लेना पड़ता था। गाँधीजी की यह कर्मभूमि आज एक तीर्थ के रूप में पूजित है। इसी तरह बापू का एक और आश्रम है जो स्वतन्त्र भारत का सबसेे बड़ा तीर्थ है-वह है ‘सेवाग्राम आश्रम’। बापू यहाँ सन् 1936 मंे आये थे। मिट्टी की दीवारों से बना, बाँस के परदे, खपरैल छप्पर, बैठके के लिए चटाई आदि से सज्जित यह ‘सेवाग्राम आश्रम’ भारत की आत्मा की तरह पवित्र दिखता है। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रिका के एक मित्र के पुत्र जालभाई रुस्तम ने अपने पिता की स्मृति में सन् 1942 में यहाँ एक अतिथि-भवन बनवाया, जिसे ‘रुस्तम मेहमान घर’ के नाम से जाना जाता है। प्राचीन ऋषि परम्परा की याद दिलाती यह कुटिया भारत की स्वतन्त्रता का इतिहास अपने अन्तर में छुपायी है। 

मार्च 1922 को साबरमती आश्रम से महात्मा गाँधी के गिरफ्तार होने से असहयोग आन्दोलन और गतिशील हो उठा। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। जज ने छः साल की सजा सुनाते हुए कहा- ‘‘मैने जीवन में आप जैसे व्यक्ति का विचार नहीं किया, भविष्य में भी नहीं करूँगा। आप अपराध स्वीकार कर रहे हैं। यदि आपको तिलक की श्रेणी में रखूँ तो आप इसे युक्तिहीन नहीं मानेंगे। यदि भारतवर्ष की अवस्था बदले और छः साल पूरा होने के पहले ही आप छूट जायें तो मुझसे ज्यादा खुश कोई नहीं होगा।‘‘ इस पर महात्मा गाँधी ने हँसते हुए कहा था- ‘‘लोकमान्य तिलक के साथ-साथ मेरा नाम जुड़ जाने के कारण मैं श्रेष्ठ सम्मान और गौरव का अधिकारी हुआ।’’ 
महात्मा गाँधी यरवदा जेल भेज दिये गये। दो वर्ष तक कारावास में रहते-रहते जनवरी 1924 में वे काफी अस्वस्थ हो गये। पूना के सैसून अस्पताल के डा0 कर्नल मेडाॅक ने उनके पेट का आॅप्रेशन किया। वे मृत्यु के मुख से बाहर आये। 5 फरवरी 1924 को गाँधीजी को जेल से छोड़ दिया गया। 

कांग्रेस में अभी भी दो विचारधाराएँ कार्यरत थीं। एक का नेतृत्व पं0 मोती लाल नेहरू, देशबन्धु और स्वराज्य दल के अन्य सदस्य कर रहे थे तो दूसरी ओर महात्मा गाँधी के नेतृत्व में डा0 राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल आदि थे। बीच-बीच में दोनों दलों के बीच समझौता भी हो जाता था। राजनीति में प्रायः ऐसा होता रहता है। राजनैतिक मतभेद ही इसे कहना ठीक रहेगा। 

नवम्बर 1928 में साइमन कमीशन भारत आया। सभी जगह पर इसका पुरजोर विरोध किया गया। लाहौर में विरोधियों पर पुलिस द्वारा लाठी-चार्ज की गई। इसमें लाला लाजपत राय घायल हो गये। आखिर 17 नवम्बर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। सारा देश एक बार फिर दहल उठा। 

कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में 21 दिसम्बर 1929 को पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पारित हो गया। स्वाधीनता के संकल्प के मसौदे को वर्किंग कमिटी द्वारा स्वीकार किया गया और 26 जनवरी 1930 को सारे देश में यह संकल्प स्वीकार किया गया। तभी से हर वर्ष 26 जनवरी को स्वाधीनता-दिवस के रूप में मनाया जाने लगा जो अपना संविधान लागू होने पर 26 जनवरी 1950 से गणतन्त्र-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

महात्मा गाँधी 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से 79 सहकर्मियों के साथ समुद्र्रतट के पास ‘दांडी’ नामक स्थान पर नमक-कानून का विरोध करने के लिए प्रस्थान किये। महिलाएँ सबसे आगे थीं। गाँधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया। श्रीमती सरोजनी नायडू सहित अनेक नेता गिरफ्तार किये गये। लोगों में इस नमक-आन्दोलन के प्रति एक विशेष उत्साह था। 

जनवरी 1931 में जेल से छूट कर महात्मा जी इलाहाबाद आ गये। यहाँ पंडित मोती लाल नेहरू काफी अस्वस्थ थे। आखिर 6 फरवरी 1931 को उनका निधन हो गया। महात्मा गाँधी काफी दुःखी थे क्योंकि एक-एक कर गोखले, तिलक, देशबन्धु, स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपत राय, मौलाना मुहम्मद अली और पंडित मोतीलाल उन्हें छोड़ कर जा चुके थे। इसी समय वायसराय लाॅर्ड इरविन से गाँधीजी का एक समझौता हुआ जिसे ‘गाँधी-इरविन पैक्ट’ के नाम से जाना जाता है। 

गोलमेज कांफ्रेंस में भाग लेने पर भी सहमति बनी और गाँधीजी 14 सितम्बर 1931 को द्वितीय गोलमेज कांफ्रेंस में भाग लेने इंग्लैंड आ गये। इंग्लैंड में उन्होंने प्रधानमंत्री लायड जार्ज, जार्ज बनार्ड शा, कर्नल मेडाॅक (जिन्होंने गाँधीजी के पेट का आॅप्रेशन किया था) आदि से मिलकर प्रसन्नता व्यक्त की। गोलमेज कांफ्रेंस से लौटते समय वे विख्यात फ्रांसीसी साहित्यिक रोमाँ रोलाँ से मिलने उनके जेनेवा स्थित मकान पर गये। बाद में इन्हीं रोमाँ रोलाँ ने महात्मा गाँधी की जीवनी पर पुस्तक लिखी। गोलमेज कांफ्रेंस से लगभग खाली हाथ ही गाँधीजी लौट आये मगर भारत आने पर उनका भव्य स्वागत किया गया। 

सन् 1934 से 1940 तक महात्मा गाँधी अपनी सारी शक्ति ग्रामीण क्षेत्र की उन्नति और अन्य रचनात्मक कार्यों में लगाने के लिए कृतसंकल्पित हो गया। सन् 1934 में बिहार के उत्तरी भाग में आये भीषण भूकम्प में वे लोगों की सहायता करने के लिए आये। लेकिन उनका एक कथन कि यह भूकम्प अस्पृश्यता के पापों का फल है, सुनकर उनकी यहाँ काफी आलोचना हुई। फिर भी महात्मा गाँधी के आदेश पर ही डा0 राजेन्द्र प्रसाद और अन्य सारे कांग्रेसी नेता सेवा-कार्य में लगे रहे। एक  बार गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर दिल्ली आये हुए थे। शान्तिनिकेतन के लिए फंड जुटाने के लिए उनकी नृत्य-संगीत मंडली भी साथ थी। 

गाँधीजी ने मिलने पर पूछा कि इस अवस्था में इतना कष्ट क्यों करते हैं? आपको कितने पैसे मिल जाने से अब आप यह कष्ट नहीं उठायेंगे। गुरुदेव का संकेत मिलने पर गाँधी जी घनश्यामदास बिरला को ‘साठ हजार’ रुपये देने का आग्रह किये। यह थी गाँधीजी की सदाशयता। यह बात सर्वविदित है कि कई मुद्दों पर गुरुदेव और महात्मा गाँधी के बीच मतभेद थे मगर आपसी प्रेम और सम्मान में कभी भी कोई कमी नहीं आयी। दोनों एक-दूसरे का हृदय से आदर करते थे। 

स्वतन्त्रता के समग्र इतिहास को एक लेख में सहेजना बिल्कुल संभव नहीं है। फिर भी कुछ प्रमुख बिन्दुओं को स्पर्श करना आवश्यक भी है। इसी कड़ी में आता है, सन् 1942 का ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’। यह बात अब भारत की जनता जान चुकी थी कि अंग्रेजी राज्य भारतीय इतिहास का एक कलंकमय अध्याय है और जितनी जल्दी इस कलंक के धब्बे को हटाया जा सके उतनी ही शीघ्रता से भारतीय जनता को त्राण मिलेगी। इधर अंग्रेज भी भारत में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना रहे थे। मुसलमानों को अलग राज्य के लिए उकसाया जा रहा था। इधर गाँधी जी ने मुहम्मद अली जिन्ना को साथ ले चलने का बहुत प्रयास किया। मगर इसमें उन्हें सफलता नहीं मिल पायी। इंग्लैंड फिर एक बार विश्वयुद्ध में उलझ गया। क्रिप्स के द्वारा भेजे गये प्रस्ताव को कांग्रेस कार्य समिति ने अस्वीकार कर दिया। इसमें पूर्ण स्वतन्त्रता का कोई आश्वासन नहीं था। इधर महात्मा गाँधी ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने से सम्बन्धित एक प्रस्ताव 8 अगस्त 1942 को बम्बई अधिवेशन में पास कराया। 

इसके पूर्व ही श्री एंड्रयूज़ का निधन अप्रैल 1940 में, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का निधन 7 अगस्त 1941 को तथा श्री जमुनालाल बजाज का निधन 11 फरवरी 1942 को हो जाने से बापू का हृदय विदीर्ण हो उठा था। 8 अगस्त 1942 की रात ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ और 9 अगस्त 1942 को ही महात्मा गाँधी सहित कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। पूना के आगा खाँ पैलेस में महात्मा गाँधी को कैद में रखा गया। सारे भारतवर्ष में गिरफ्तारियाँ होने लगी। आगा खाँ पैलेस में ही 15 अगस्त 1942 को महादेव देसाई का निधन हृदयगति रुकने से हो गया। वहीं उनकी अन्त्येष्टि की गई। इसी कैद में 20 मई 1944 को कस्तूरबा का निधन हो गया। उनका दाह-संस्कार भी आगा खाँ महल में किया गया। गाँधीजी ने तब कहा था- ‘‘जितना दुःख होने की बात सोची थी, उससे अधिक हो रहा है।’’ 20 मई 1944 को गाँधीजी को बिना शर्त रिहा कर दिया गया। 

इधर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस कलकत्ता से धनबाद होते हुए गोमो जंक्शन से देश के बाहर निकल भागे थे। उन्होंने ‘आजाद हिन्द फौज’ की स्थापना की। विश्वयुद्ध में वे जापान के साथ मिलकर भारत की स्वतन्त्रता-लड़ाई की योजना बना रहे थे। आजाद हिन्द फौज के भी बहुत से लोग गिरफ्तार थे। आखिर अप्रैल 1946 में महात्मा गाँधी जी के आग्रह पर श्री जयप्रकाश नारायण, डा0 राममनोहर लोहिया तथा आजाद हिन्द फौज के लोगों को जेल से रिहा किया गया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने मार्च 1946 में घोषणा किया कि भारत डोमिनियन के रूप में रह सकता है तथा इच्छा करने पर पूर्ण स्वतन्त्र भी हो सकता है। 

इधर जिन्ना साहब अंग्रेजों के रहते ही भारत का बँटवारा कराने के लिए बैचेन थे। गाँधीजी किसी भी कीमत पर देश का बँटवारा नहीं चाहते थे। भारत में उस समय लाॅर्ड बावेल वायसराय थे, जो भारत को छिन्न-भिन्न करना चाहते थे। भारत में कई स्थानों पर वीभत्स साम्प्रदायिक दंगे होने लगे। आखिर मार्च 1947 में लार्ड बावेल की जगह लार्ड माउण्टबेटन को भारत का वायसराय बना कर भेजा गया।  भारत आने के बाद लार्ड माउण्टबेटन भी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वर्तमान परिस्थिति में भारत का विभाजन अनिवार्य है। 

आखिर कांग्रेस, लीग और अंग्रेजी सरकार की सम्मति से देश का विभाजन हुआ। देश आजाद हो गया मगर विभाजित होकर। भारत हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दो खण्डों में विभक्त हो गया। गाँधीजी का दिल भी टूट गया। जिस दिन 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर तिरंगा फहराया जा रहा था उस दिन गाँधीजी दिल्ली से बहुत दूर कलकत्ता में महादेव देसाई स्मृति-दिवस उपवास के साथ मना रहे थे। उस दिन उन्होंने केवल प्रार्थना की और गीता पाठ किया तथा सूत काटते रहे। उस दिन कोई वक्तव्य नहीं दिया। 

साबरमती का संत मौन हो गया था। सारा देश साम्प्रदायिकता की आग में जल रहा था। मानवता बिल्कुल नंगी हो गई थी। देश में दंगों का दावानल भड़कता जा रहा था। बच्चे, औरतें, वृद्ध सभी मृत्यु के शिकार हो रहे थे। अंग्रेजों की विकृत मनोवृत्ति का परिणाम अब सामने था। इस देश की अवस्था देखकर गाँधीजी अत्यन्त चिन्तित हो उठे। कांग्रेस के सत्तासीन होते ही उसकी विकृतियाँ उजागर होने लगी। गाँधीजी इस स्थिति में कांग्रेस को भंग करने की सोचने लगे। उन्हें लगने लगा कि अब स्वतन्त्र भारत में उनकी बात ठीक से नहीं सुनी जा रही है।  
      
गाँधीजी ने 13 जनवरी 1948 को दिल्ली में साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए उपवास रख लिया। सभी सम्प्रदाय के नेताओं के आश्वासन पर 18 जनवरी 1948 को उपवास भंग किया। लोगों में एक अफवाह फैला दी गई कि गाँधीजी अल्पसंख्यकों के समर्थक हैं। इस बात को एक घटना से और भी हवा मिल गई कि भारत-विभाजन के समय सम्पत्ति के बँटवारे में पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपया देने के लिए गाँधीजी सहमत थे।

मगर पाकिस्तान द्वारा काश्मीर में आक्रमण करने के कारण भारत-सरकार द्वारा यह रुपया देना स्थगित कर दिया गया था। गाँधीजी का मत था कि इस विषय में उदार होने की जरूरत है और यह रुपया पाकिस्तान को दे देना चाहिए। भारतीय मंत्रीमंडल ने गाँधीजी की शैय्या के पास बैठक करके अपने पूर्व फैसले में परिवर्तन करके यह रुपया पाकिस्तान को देने का निर्णय किया। भारत में इसकी प्रतिक्रिया अच्छी नहीं हुई। गाँधीजी के विरोध में उग्र स्वर उभरने लगे। 

30 जनवरी 1948 की सुबह गाँधीजी ने कांग्रेस को भंग कर उसे ‘लोक सेवक संघ’ के रूप में परिवर्तित करने का एक मसौदा तैयार किया और अपने सेक्रेटरी प्यारे लाल के हाथ में दे दिया। मगर विधि को कुछ और ही मंजूर था। उसी दिन शाम को बिरला-निवास में प्रार्थना-सभा में जाते समय नाथूराम गोडसे नामक एक व्यक्ति ने पास आकर प्रणाम की मुद्रा में अपनी पिस्तौल से उन पर तीन गोलियाँ चला दी और वहीं ‘हे राम!’ कहते हुए बापू गिर पड़े। एक युग का अन्त हो गया। महात्मा गाँधी अब नहीं रहे। सारा देश शोकाकुल हो उठा। 

गाँधीजी की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। एक बार विनोबा जी से किसी ने पूछा था कि महात्मा गाँधी जी को केवल गाँधी कहा जाए अथवा गाँधी जी? विनोबा जी ने कहा था-‘‘यदि उन्हें व्यक्ति के रूप में मानते हो तो ‘गाँधी जी’ कहना चाहिए और यदि उन्हें विचार के रूप में मानते हो तो केवल ‘गाँधी’ कहना चाहिए।’’ वास्तव में महात्मा गाँधी स्वयं एक व्यक्ति से बढ़कर विचार हैं, वह विचार जो भारत की आत्मा को प्रकाश देता रहेगा। महात्मा गाँधी ने स्वयं कहा था-‘‘मेरा कोई अपना वाद नहीं है। गाँधीवाद कोई अलग चिन्तन नहीं है। सत्य और अहिंसा का प्रयोग भारतीय संस्कृति का अंग है और उसे ही सत्याग्रह के रूप में मैंने अपने जीवन में उतारा।’’ फिर भी गाँधीजी को अवतार घोषित करने का भी प्रयास किया गया। भारत की स्वतन्त्रता के लिए भगवान् के रूप में गाँधी का अवतार। मगर स्वयं गाँधीजी ने इसे सख्ती से दबा दिया और अवतारवाद की गाथा को पनपने नहीं दिया। यहाँ तक कि ‘महात्मा गाँधी की जय’ का नारा सुनकर भी वे नाराज हो जाते थे। कई बार इसके लिए लोगों को मना भी किया।

महात्मा गाँधी समय की नब्ज पहचानते थे। किसी भी आयोजन में बिलम्ब होने से उन्हें खीज होती थी। एक बार सन् 1925 में ढाका में एक जगह पर कार्यक्रम में जा रहे थे। सामने बड़ा पोस्टर लगा था, जिसमें बंगला में लिखा था- महात्मा गाँधी की वक्तृता-समय बारह बजे दिन। उन्होंने अपनी जेब से घड़ी निकाली। तीन बजने वाले थे। उन्होंने कहा- हमारी स्वतन्त्रता हमेशा तीन घंटा लेट रहेगी। ऐसा था उनके समय-पालन का संकल्प। 

महात्मा गाँधी के जीवन के 70 वर्ष पूरे होने पर डा0 राधाकृष्णन् के द्वारा उनके जीवन-वृत्त पर एक पुस्तक सन् 1939 में प्रकाशित की गई थी, जिसमें प्रख्यात वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन, पर्लबक, बर्टेण्ड रसेल और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के आलेख थे। डा0 राधाकृष्णन जब दिसम्बर 1947 में गाँधी जी से दिल्ली के बिरला-हाउस में मिले थे तो उन्होंने अपनी सद्यःकृति श्रीमद्भगवद्गीता को उन्हेेें समर्पण करने के लिए स्वीकृति मांगी। इस पर गाँधी जी ने हँसते हुए कहा था-‘‘आप तो मेरे कृष्ण हैं और मैं आपका अर्जुन, फिर इस महान ग्रंथ को मुझे कैसे समर्पित करेंगे।‘‘ मगर अन्त में गाँधीजी ने इसके लिए स्वीकृति दे दी। 

गाँधी सचमुच एक विचार थे। जहाँ कहीं भी मानवता कराहती थी, गाँधी वहाँ खड़े रहते थे। वे न तो कोई शास्त्रज्ञ थे और न दार्शनिक। उन्होंने राजनीति में आध्यात्मिकता का प्रयोग किया। 

आज भी अगर राजनीति को अध्यात्म की सुगन्धि से पवित्र कर दिया जाय तो यह मानवता का सौभाग्य होगा। मगर अध्यात्म में भी यदि राजनीति घुस जायेगी तो वह मानव-मात्र के लिए दुर्भाग्य होगा। इसलिए गाँधी आत्मा की आवाज सुनने के लिए आग्रह करते हैं। गाँधीजी जहाँ राजनीति को अध्यात्म के प्रकाश में आगे बढ़ाते हैं, वहीं समाज-सुधार के कार्यों में भी सात्त्विकता का समावेश करते हैं। वर्ण-भेद की समस्याएँ, नारी-अधिकार से जुड़ी समस्याएँ, दलितों की कथा-व्यथा, गरीबों और दीन-दुखियों की समस्याओं के समाधान के लिए गाँधीजी प्रयत्नशील दिखते हैं। नैतिकता के सहारे वे सामाजिक समस्याओं का समाधान ढ़ूँढ़ते हैं। 

प्रायः यह बात सभी जानते हैं कि बिड़ला-परिवार से गाँधीजी की घनिष्ठता थी। एक बार घनश्यामदास बिड़ला जी ने बापू से पूछा था-‘‘बापू ! आप जीवन भर तो अंग्रेजों से लड़ते रहे, अब आपकी लड़ाई किससे होगी ?’’ बापू ने तपाक से कहा था ‘तुमसे!’ यानी पूंजिपतियों के शोषण के विरुद्ध गाँधी जी की लड़ाई का यह संकेत था। गाँधीजी ने ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘‘ के साथ ‘‘सर्वे सन्तु निरामयाः‘‘ का भी नारा दिया। बापू का सर्वधर्म समभाव और दरिद्र नारायण की कल्पना, इसी चिन्तन के परिणाम थे। 

भारत गाँवों का देश है, इसलिए गाँधीजी ने गाँवों के विकास पर जोर देने की जो बात कही थी, वह अभी भी प्रासंगिक है। ‘ग्राम स्वराज्य’ स्थापित करने की उनकी परिकल्पना भारत के आर्थिक विकास की रीढ़ है। इसे आज भी मजबूत करने की आवश्यकता है। स्वदेशी आर्थिक आजादी और आत्मनिर्भरता भारत के विकास का मूल-मंत्र है - यह स्वप्न गाँधीजी ने बहुत पहले देख लिया था। मगर आज अपना देश अभी भी भूलभुलैया में भटक रहा है। 
      गाँधीजी के बारे में प्रख्यात इतिहासकार अनाल्र्ड टायनबी ने कहा था - ‘‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी मानव की यदि दो महान् उपब्धियाँ हैं तो मानवीय सम्बन्धों का ह्रास उसकी महान् असफलता है। इसका सबसे अन्धकारमय क्षेत्र राजनीति का है। किन्तु निश्चित ही गाँधीजी ने बिना अपने दामन पर कोई दाग लगाये सत्ता से अलग रहकर राजनीति का भी अध्यात्मीकरण कर दिया।‘‘ इसलिए गाँधीजी न केवल कल के लिए प्रासंगिक थे, बल्कि आज के लिए भी हैं और आने वाले कल के लिए भी रहेंगे। वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने महात्मा गाँधी की मृत्यु पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा था-‘‘आने वाले पीढ़ी को मुश्किल से यह विश्वास होगा कि हमारे बीच भी कोई हाड़-मांस का ऐसा आदमी था।’’ उस समय के अमेरिकी जनरल में आर्थर ने भी कहा था-‘‘किसी-न-किसी दिन दुनिया को गाँधीजी की बात सुननी ही पड़ेगी, नहीं तो हिंसा के रास्ते दुनिया का विनाश हो जायेगा।’’ इन सब उक्तियों के बीच शायद गाँधीजी की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।

सर एटेनबरो ने ‘गाँधी’ फिल्म सन् 1984 में बनाकर सारे विश्व को गाँधीजी की याद दिला दी। नई पीढ़ी इसे देखकर शायद चैंक गई होगी। ‘किंग्सले’ ने अपनी भूमिका में गाँधीजी को जीवन्त कर दिया। सर एटेनबरो के ‘गाँधी’ दर्शकों में एक सिहरन पैदा कर देते हैं। मगर गाँधी अभी भी भारत के सभी प्रमुख कार्यालयों में फोटो-फ्रेम में बँधे कुछ बेबस-से नजर आते हैं। भारत में कहाँ है ‘गाँधी’ और कहाँ है ‘गाँधीवाद’, शायद ढ़ूँढ़ने के लिए भटकना पड़ेगा। गाँधीजी को हर वर्ष दो अक्टूबर को जगाया जाता है और फिर उन्हें सुला दिया जाता है। आखिर गाँधी के साथ यह आँख-मिचैली का खेल कब तक चलता रहेगा?

गाँधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ भी कहा गया। मगर उनकी आलोचना भी कम नहीं हुई। हिन्दुओं ने उन्हें मुसलमानों का पक्षधर बतलाया तो मुसलमानों ने उन्हें हिन्दुओं का समर्थक कहा। उनकी अहिंसा को किसी ने कायर की नीति बतलायी तो उनके सत्य के प्रयोग को किसी-किसी ने अव्यावहारिक बतलाया। राजनीति में तो भतभेद होते रहते हैं मगर वेे किसी विषय के संदर्भ में होते हैं। कभी बालगंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपत राय गरम-दल के नेता माने जाते थे तो गोखले जी और गाँधी जी को नरम-दल का नेता माना जाता था। कभी पंडित मोती लाल नेहरू और देशबन्धु चितरंजन दास गाँधीजी के सिद्धान्त से मत-भिन्नता प्रकट करते तो कभी नेताजी सुभाषचन्द्र के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर गाँधीजी की प्रतिक्रिया आती -‘पट्टाभि की हार मेरी हार है’’। अन्त में वैचारिक मतभेद से नेताजी को कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा। मगर इन सभी राजनैतिक मत-भिन्नताओं के बावजूद गाँधीजी भारत की राजनीति में सर्वाधिक शक्तिमान् होकर उभरते रहे। 

लाहौर लेजिसलेटिव एसेंबलि में 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बम फेंकने पर क्रान्तिकारियों ने जो पर्चा फेंका था, उसमें लिखा था-‘‘बहरों को सुनाने के लिए जोरदार धमाके की जरूरत है।’’ क्रान्तिकारी बम फेंक कर भागे भी नहीं। मगर 1931 में गाँधी-इरविन वार्ता के समय जब इन क्रांतिकारियों की फाँसी की सजा को भी एक मुद्दा बनाने की बात गाँधीजी से कही गई तो उनका उत्तर सकारात्मक नहीं था-ऐसा प्रायः कहा जाता है। इस बिन्दु पर गाँधीजी की आलोचना की जाती है। मगर गाँधी जी सभी आलोचनाओं का शान्तिपूर्वक सामना करते रहे। 

देश के बँटवारे का सख्त विरोधी होने पर भी उन्हें इसके लिए आलोचना सहनी पड़ी। यांत्रिक युग में चरखा चलाने पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया गया। अपने ज्येष्ठ पुत्र हरिलाल गाँधी की विद्रोही मानसिकता के लिए भी गाँधी पर ही दोष मढ़ दिया गया। इसके साथ विश्व-मानवतावाद के परिप्रेक्ष्य मंे राष्ट्रीयता की धार कंुद करने का भी उन पर आरोप लगाया गया। शान्ति की आड़ मंे समझौतावादी होने का लेबल भी लगाया गया। मगर इन सबके बावजूद गाँधीजी  की महानता पर कोई आँच नहीं आई। उनका नाम राष्ट्र की रगों में एक प्रखर शक्ति बनकर उभरता रहा। कभी ’बापू’, कभी ’महात्मा’ तो कभी ‘साबरमती के सन्त’ के रूप में वे पूजित होते रहे। 

गाँधी जी ने अपने जीवन में कम-से-कम तीन क्रान्तियों- जातिवाद, नस्लवाद और हिंसा के विरुद्ध क्रान्ति  को एक नया आयाम दिया और कुछ हद तक उसे सफलता के सोपान तक भी पहँुचाया। उन्होंने उच्च साध्य के लिए पवित्र साधन की आवश्यकता पर भी बल दिया। साध्य और साधन का सीधा सम्बन्ध अच्छाई से होना चाहिए। 

विंस्टन चर्चिल ने उन्हें ‘अधनंगे फकीर’ की उपाधि दी। गाँधीजी के साथ सचमुच एक ‘महात्मा’ का प्रभा-मंडल जुड़ गया था, जो जीवन-पर्यन्त उनके साथ ही रहा। शायद उनकी हत्या के बाद यह प्रभा-मंडल और अधिक प्रकाशमान् ही हुआ है। 

आज गाँधी और गाँधीवाद की दुन्दुभि बजाने वाले नेता अपने काले-कारनामों से उन्हें बार-बार सलीब पर टाँग रहे हैं। इन तथाकथित नेताओं द्वारा बार-बार उनकी हत्या की जा रही है। भ्रष्टाचार का ताण्डव गाँधीवाद को चिढ़ा रहा है। अनीति की भीत्ति पर राजनीति का पौधा पनपाया जा रहा है। नैतिकता को लकवा मार गया है। समाचार-पत्रों और मीडिया में रोज नेताओं के किस्से छन कर आ रहे हैं। राष्ट्रीयता भी गूँगी होती जा रही है अथवा उसे गूँगी बनाने का उपक्रम चल रहा है। यह सब आज गाँधी के भारत में हो रहा है। 

कहाँ गई वह राष्ट्रीय चेतना की जागृति? आज भी कवि प्रदीप (श्री राम वचन द्विवेदी) का फिल्म ‘जागृति’ का गीत हर वर्ष 2 अक्टूबर, 26 जनवरी और 15 अगस्त को कानों में सुनाई पड़ता है-‘‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’’ और चैराहे पर आती-जाती भीड़ शायद शून्य में झाँक कर इसका अर्थ ढ़ूँढ़ना चाहती है। 

आज भी राजनीति भले ही गाँधी को विस्मृत करती जा रही है, मगर गाँधी अभी भी भारत की मिट्टी की गंध में, यहाँ की बहती हवाओं में, यहाँ के खेत- खलिहानों में, यहाँ के भोले-भाले लोगों की धड़कन में जीवन्त हैं। गाँधीजी की प्रासंगिकता अभी मरी नहीं है और न मरेगी। देश की हर पीड़ादायक घटना के पीछे आम आदमी चिहुँक कर बोल उठता है-‘काश ! आज गाँधी होते।’ देश की दुरवस्था सुधारने के लिए साबरमती आश्रम भी आज गाँधीजी को खोज रहा है। 

‘साबरमती के संत‘ आज का परिदृश्य देखकर शायद मौनव्रत पर चला गया है। उससे कौन कहे-‘तू मौन त्याग दे तपी आज।’ मौनता को हम सब भी ओढ़े हुए हैं। अपनी आत्मा की आवाज सुनें तो सही, शायद साबरमती का संत उसी माध्यम से कुछ बोल रहा हो! 
 
 
Ref. Picture source from Samacharjagat.com. Article source from Apani Maati Apana Chandan, Author- Sukhnandan singh saday.